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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 517

७५८ मार्क्सवाद और रामराज्य
स्फुरित होगी ? क्योंकि यावत् हेत्वाश्रयवर्ति साध्य समानाधिकरण ही व्याप्ति होती
है । यदि सकलविशेषोपसंहारवती व्याप्तिका स्फुरण न होगा तो अनुमान क्या होगा ?
यदि संवित्का स्वतः स्फुरण मान्य है तब भी व्याप्ति व्यभिचार होनेसे अनुमानका
उदय कैसे होगा ? तथा उक्त अनुमानसे आत्मा या साक्षीकी ज्ञेयता नहीं सिद्ध हो
सकती । “अज्ञेयत्वे सति प्रकाशमानता” ही स्वप्रकाशता है (यहाँ ज्ञेयताका
तात्पर्य अपरोक्ष ज्ञान विषयतासे है । तथा च अनुमानद्वारा आत्माके ज्ञेय होनेपर भी
सिद्ध साधनता नहीं ) जो ज्ञानका अगोचर होकर प्रकाशमान हो वह स्वप्रकाश
होता है । प्रकाशमानता या भासमानता भी भानविषयता नहीं है । किंतु व्याव-
हारिक बाधरहित ‘भासते” इत्याकारक शब्दकी लक्ष्यता ही है । अर्थात् जिसका
बाध नहीं होता है ऐसे “प्रकाशते” इस शब्दका जो लक्ष्य है वही भासमानता है ।
वेदान्तसे ज्ञेय होनेपर भी स्वप्रकाशतामें कोई विरोध नहीं होता । क्योंकि
निरुपाधिक ब्रह्मवेदान्त महावाक्यजन्मवृत्तिका अविषय होनेपर भी वृत्तिके द्वारा
आवरण भङ्ग होनेमात्रसे भासमान होता है । वेदान्तवाक्यजन्य वृत्तिरूप उपाधिके
द्वारा ही उसमें ज्ञेयता भी व्यवहृत होती है । अतएव जो कहा जाता है कि स्वप्रकाश
ब्रह्म अनुमानज्ञेय होता है यह भी निःसार है । क्योंकि यहाँ भी अनुमितिरूप
उपाधि रहनेसे ही ब्रह्ममें अनुमान ज्ञेयता होती है ।
नित्य साक्षात्कारता अनागन्तुक प्रकाशत्वमें हेतु है । संविद्से अभिन्नता ही
साक्षात्कारता है । यहाँ संविद् शब्दका नित्यबोध अर्थ है, वृत्तिरूप ज्ञान नहीं । इन्द्रिय-
जन्य प्रतीतित्व यहाँ साक्षात्कारता अभिप्रेत है । संविद्में संविद्भिन्नता स्वतः
होती है । अन्य विषय संविद्में अध्यस्त होनेसे संविद्भिन्नता होती है । अधिष्ठान-
सत्तासे अतिरिक्त अध्यस्तकी सत्ताका न होना ही अध्यस्तका संविद्से अभिन्नता है ।
इस सम्बन्धमें अनुमान भी है ‘आत्मा स्वयं प्रकाशः शश्वदपरोक्षत्वात्, यन्नैवं
तन्नैवं यथा घटः’ । अर्थात् शश्वत् प्रत्यक्ष होनेसे आत्माको स्वयं प्रकाश मानना चाहिये।
घटादि कभी अपरोक्ष होते हैं, शश्वदपरोक्ष नहीं होते । अतः वे स्वप्रकाश नहीं होते हैं।
‘आत्मा शश्वदपरोक्षः शश्वदसंदिग्धत्वात्, व्यतिरेके घटवत्’ अर्थात् आत्मा सदा
अपरोक्ष ही है क्योंकि उसमें सदा ही संशय-विपर्यय, अज्ञान-शून्यता रहती है । घटादि
ऐसे नहीं हैं अतः वे अपरोक्ष भी नहीं हैं ( भले ही वेदान्तवेद्य अखण्डानन्द
आकारसे आत्मा संदिग्ध होता है अतएव वही शास्त्रका विषय होता है, तथापि
ज्ञान, सुखादि साक्षिरूपसे आत्मा सदा ही असंदिग्ध रहता है । )
यहाँ अप्रसिद्ध विशेषता नहीं कही जा सकती है अर्थात् स्वप्रकाशत्वरूप
साध्य अप्रसिद्ध है यह नहीं कहा जा सकता । क्योकि निम्नोक्त अनुमानसे
स्वप्रकाशता प्रसिद्ध हो जाती है । “अयं घटः,, एतदन्यज्ञेयत्वरहितभासमानान्यः,
द्रव्यत्वात् घटवत्” । यहाँ ‘अयं घटः’ पक्ष है । यह यद्यपि ज्ञेय है तथापि यह पक्ष