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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 514

मार्क्स और आत्मा ७७५
प्रति स्वप्रत्यक्षताके लिये अन्तःकरण वृत्तिरूप अनुभवकी अपेक्षा रखता है। परन्तु
वह अनुभव स्वयं जड़ होते हुए भी स्वच्छ होनेके कारण चैतन्य प्रतिबिम्ब ग्रहण
करनेके लिये दूसरे अनुभवकी अपेक्षा नहीं रखता। किन्तु स्वच्छ होनेसे स्वयं
चैतन्यके प्रतिबिम्बको ग्रहण कर लेता है और उसीसे स्वयं भी प्रकाशित हो जाता
है। अतएव अनवस्था भी न होगी। ऐसा कभी नहीं होता कि अनुभव उत्पन्न हो
और प्रमाताको उसका प्रत्यक्ष न हो। किन्तु नीलादि अर्थ ऐसे नहीं होते। वे तो
रहते हुए भी जबतक वृत्तिरूप अनुभव न हो तबतक प्रमाताके लिये प्रत्यक्ष नहीं
होते। अतः जैसे छेत्ता छिदि क्रियाके द्वारा छेद्य वृक्षादिपर व्याप्त होता है। अन्य
छिदिद्वारा छिदिपर ही नहीं व्याप्त होता और यह भी नहीं कि छिदि ही छेत्री हो
जाती हो, किन्तु देवदत्तादि छेत्ता ही छिदिक्रियाके द्वारा छेद्यवृक्षादिपर व्याप्त होता
है। इसी तरह पक्ता (पाचक) पाकके द्वारा पाक्य तण्डुलादिपर व्याप्त होता है,
न कि पाकान्तरसे पाकपर व्याप्त होता है और न पाक ही पक्ता होता है। वैसे
प्रमाता प्रमेय नीलादि पदार्थोंपर प्रमाद्वारा व्याप्त होता है न कि प्रमान्तरसे प्रमाण-
पर व्याप्त होता है और न प्रमा प्रमात्री होती है। किन्तु स्वतः ही प्रमाता प्रमापर
व्यापक होता है।
कूटस्थ नित्य चैतन्य स्वरूप प्रमाताके लिये दूसरी प्रमा अपेक्षित नहीं होती
है, क्योंकि प्रमाताको अपनी प्रमाके लिये यदि अन्य प्रमाताकी अपेक्षा होगी तब तो
अनवस्था दोष अनिवार्य ही रहेगा। अतः यही ठीक है कि विज्ञान ग्रहणमात्रके लिये
विज्ञान साक्षी प्रमाता आवश्यक है। कूटस्थ नित्य चैतन्यरूप प्रमाताके ग्रहणकी
आकाङ्क्षा ही नहीं उठती। क्योंकि उसमें संशय-विपर्यय अज्ञान है ही नहीं, फिर
इनके निवर्तक ज्ञानान्तरोंकी आवश्यकता ही क्या है ? अन्यत्र संशय, विपर्यय करता
हुआ भी प्रमाता अपने सम्बन्धमें संशयादि नहीं करता है। जैसे प्रकाशस्वरूप
दीपक आदिमें "प्रकाशते" यह व्यवहार स्वतः होता है। अप्रकाशरूप घटादिमें
प्रकाश संसर्गसे 'प्रकाशते' यह व्यवहार होता है, वैसे नित्य चैतन्य परम प्रकाश-
स्वरूप आत्मामें 'प्रकाशते' यह व्यवहार स्वतः होता है। तद्भिन्न जड़ोंमें आत्माके
सम्बन्धसे 'प्रकाशते' ऐसा व्यवहार होता है। आत्मा और अनात्माका आध्यासिक
ही सम्बन्ध होता है। उसी सम्बन्धके लिये वृत्तिकी आवश्यकता होती है। कारण साक्षी
और वृत्तिरूप साक्षी सम नहीं।
जो कहा जाता है—ज्ञान-ज्ञान सम होनेसे दो दीपकोंके समान दो
ज्ञानोंमें प्रकाश्य-प्रकाशकभाव नहीं बन सकेगा, उसका भी समाधान
इसीसे हो जाता है। कारण साक्षी और वृत्तिरूप प्रत्यय सम नहीं है, किंतु
एक जड़ है, दूसरा चित् है। अतः अवभास्य-अवभासक बननेमें कोई बाधा
नहीं है। भले ही सम होनेसे ज्ञानोंमें परस्पर ग्राह्य-ग्राहकभाव न बनें परन्तु ज्ञाता और