मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअमूर्त सदसद्धर्म है, क्योकि शशविषाणको भी अमूर्त कह सकते हैं। यही बात
बौद्धकारिकामें कही गयी है—
अनादिवासनोद्भूतविकल्पपरिनिष्ठितः ।
शब्दार्थस्त्रिविधो धर्मो भावाभावोभयाश्रयः ॥
भाव यह है कि अनादिवासनाजन्य सविकल्प प्रत्यय स्वरूपज्ञानसे परिनिष्ठित
अर्थात् विषयीकृत शब्दार्थ तीन प्रकारका होता है। जैसे भाव—नीलत्वादि, अभाव—नर-
विषाणत्वादिरुभया भय, अमूर्तत्वादि। इसी तरह मोक्षप्रतिज्ञा भी भेदसाध्य ही है। जो
मुक्त होता है, जिससे मुक्त होता है, जिस साधनसे मुक्त होता है और जो प्रतिपादन
करता है, ये सब अनेक ज्ञान-साध्य हैं।
पूर्वोक्त युक्तिसे जब ज्ञानभेद ही असिद्ध है, तब इन सबमें अपेक्षित भेद
कैसे सिद्ध होगा ! अतः अनेक अर्थोका प्रति संधान करनेवाले एक प्रतिसन्धाता,
प्रत्यभिज्ञाताके बिना यह असम्भव है। विज्ञानसे भिन्न उसका आलम्बन न होकर
अगर स्वांश ही विज्ञानका आलम्बन हो तो उक्त व्यवस्था कथमपि न बन सकेगी।
कर्म फलभाव एवं ज्ञान-ज्ञेयभाव भी भेदमें ही सम्भव होता है। अभिन्न ज्ञानमें ही
ग्राह्य-ग्राहक भाव कैसे सम्भव होगा ? छिदि क्रियाके द्वारा तद्भिन्न काष्ठ
आदि छिन्न होता है, स्वयं छिदि ही छिदिसे छिन्न होती नहीं देखी जाती । इसी
तरह पाक क्रिया ही नहीं पकती, अपितु पाक क्रियासे तण्डुल पकते हैं। उसी तरह
यहाँ भी ज्ञान ही स्वांशसे ज्ञेय नहीं होता है, क्योकि अपनेमें ही अपनी वृत्ति विरुद्ध है।
जैसे पाकसे अतिरिक्त तण्डुल, छिदिसे पृथक् छेद्य काष्ठ होता है, वैसे ज्ञानसे अति-
रिक्त ज्ञेय होता है। अतः ज्ञानज्ञेयका भेद ही है।
इसके अतिरिक्त यह बात भी विचारणीय है कि जब घटविज्ञान, पटविज्ञान
आदि अनुभवोंके अनुसार जैसे विज्ञानको स्वीकार किया जाता है वैसे
घट-पटादि बाह्यार्थोंको अङ्गीकार क्यों न किया जाय ? यदि कहा
जाय कि विज्ञानका अनुभव होता है, तो उसी तरह बाह्यार्थ घटादिका भी
अनुभव होता ही है। यदि कहा जाय कि विज्ञान प्रकाशात्मक होनेसे प्रदीपवत् स्वयं
अनुभूत होता है। बाह्यार्थ इस प्रकार नहीं अनुभूत होता तो यह भी ठीक नहीं ।
क्योकि जैसे 'अग्नि अपनेको जलाता है', यह कहना अत्यन्त विरुद्ध है, वैसे विज्ञान
अपनेको जानता है, प्रकाशित करता है। यह कहना भी अत्यन्त विरुद्ध है। यह कहा ही जा
चुका है कि पाक अपनेको नहीं पकाता है । फिर बाह्यार्थ स्वव्यतिरिक्त विज्ञानसे
प्रकाशित होता है यह लोकप्रसिद्ध तथा अविरुद्ध ही है । अप्रसिद्ध एव विरुद्ध
बातको मानना और अविरुद्ध एव लोकप्रसिद्ध बातको न मानना यह विज्ञानवादी
बौद्धोका कैसा पाण्डित्य है ? अतः यह कहना सर्वथा निराधार है कि विज्ञेयसे अभिन्न
विज्ञान स्वयं ही अनुभूत होता है। क्योकि स्वसे स्वक्रियाका होना विरुद्ध है।
गा० रा० ४८-