मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआधानकी एक सामर्थ्य होनी चाहिये । फिर तो अन्यनील सतानोंका सन्निधान रहने-
पर भी नीलज्ञान न होना चाहिये, परतु यह 'सब अनुभवविरुद्ध है । अतः नील-
पीतादि सतानोंके समान ही स्वकारणाधीन उत्पन्न होनेवाले क्षणान्तरोंमें भी किन्हीमे
सामर्थ्य विशेष होता है किन्हीमें नही । इस प्रकार एक आलयविज्ञान सन्तति-
पतित क्षणोमे किसी ही ज्ञानक्षणमें सामर्थ्य विशेष होता है किसीमे नही होता । स्वप्रत्यय
( पूर्वोत्पन्न नीलज्ञान ) से आसादित वही सामर्थ्यातिशय वासना है ।
किसीसे नीलाकार ही ज्ञान होता है पीताकार नही और किसीसे पीताकार ही
ज्ञान होता है इस तरह वासनावैचित्र्यसे ही ज्ञानवैचित्र्य बन सकता है ।
विज्ञानवादीके कहनेका सार यह है कि बाह्यार्थवादमे भी नीलादि अर्थ क्षणिक
होते है तथाच नीलसन्तान भी अनेको होते है । उनमे भी संतानभेदसे यदि शक्ति-
भेद माना जाय तो लीलादि सतानोंमें भी एक प्रकारकी शक्ति न सिद्ध होगी ।
तथा च एक ही नील नीलाकार ज्ञान उत्पन्न कर सकेगा, संतानान्तरवर्ती नील
नीलाकार ज्ञानका उत्पादक न हो सकेगा । अतः क्षणभेदसे सामर्थ्यभेद माननेमे
जो दोष आते हैं, संतान-भेदसे सामर्थ्यभेद माननेपर भी वे ही दोष हो सकते हैं ।
अतः कहना पड़ेगा कि जैसे किन्ही संतानोंके परस्परभिन्न रहनेपर भी उनमें समान
सामर्थ्य होता है तभी अनेक नीलसंतानोंसे समानरूपसे नीलाकारज्ञान उत्पन्न हो
सकता है । अतः सौत्रान्तिकको मानना पड़ेगा कि अनेक नीलपीतादि सतानोमे
स्वकारणभेदसे ही सामर्थ्यभेद होता है । तथा च कोई नीलज्ञानका जनक होता है
कोई पीत ज्ञानका । इसी तरह आलयविज्ञानपतित क्षणोके सम्बन्ध भी व्यवस्था
हो सकती है । किन्ही क्षणोंमें ही उस प्रकारसे आसादित वासनारूप
सामर्थ्यातिशय होता है, जिससे नीलादि प्रवृत्तविज्ञान होते हैं । सबमे वह
सामर्थ्य नही होता । अतः न तो यही कहा जा सकता है कि हर एक आलय
विज्ञानसे नीलज्ञान होता रहेगा और न यही कहा जा सकता है कि एक ही
आलयविज्ञानसे एक ही नील ज्ञान होगा ।
इस तरह वासनावैचित्र्यसे सज्ञानवैचित्र्य बन सकता है । अतः प्रत्ययसे अति-
रिक्ति बाह्यार्थके सद्भावमे कोई प्रमाण नहीं है । इस तरह आलयविज्ञान संतान-
पतित असविदित पूर्वज्ञान ही वासना है । यद्यपि पहले शक्तिको वासना कहा गया
था पर यहाँ शक्ति शक्ति मानकर अभेद समझकर पूर्व विज्ञानको ही वासना कहा
गया है । वर्तमान ज्ञानमे विदित होता है, अनागत असिद्ध ही है । अतः पूर्वविज्ञानको
ही असविदित कहा गया है । वासनाके वैचित्र्यसे ही नीलादि अनुभवोमे भी
विचित्रता बनती है । पूर्वविज्ञानमे विचित्रता कैसे हुई इस शंकाका समाधान यही
है कि अनादि संसारमे पूर्व-पूर्व नीलादि अनुभवोंसे ही उत्तरोत्तर विज्ञानोंमे वासना-
वैचित्र्य सम्पन्न होता है ।