मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआत्मा ) का आविर्भाव नहीं मानते हैं । जब देशकृत या कालकृत विप्रकर्ष सम्भव
ही नहीं तो मनानान्तर सन्निधान भी सर्वदा रहेगा ही, फिर प्रवृत्ति विज्ञानको सदा
ही उत्पन्न होते रहना चाहिये किंतु प्रवृत्ति विज्ञानकी कादाचित्कता ही प्रत्यक्ष है,
अतः बाह्यार्थ मानना अत्यावश्यक है उसके बिना कादाचित्क प्रवृत्तिविज्ञान नहीं
बन सकता ।
सौत्रान्तिकके इस मतका खण्डन करता हुआ विज्ञानवादी कहता है कि
वासना वैचित्र्यसे प्रत्यय वैचित्र्य उत्पन्न हो ही सकता है । उनका अभिप्राय यह है कि
स्वसंतानसे ही प्रवृत्तिविज्ञानोंकी उत्पत्ति मानी जायतो भी उसके कादाचित्कत्वकी उपपत्ति
हो जायगी । अतः सौत्रान्तिकके बाह्यार्थ साधक हेतुकी विपक्ष व्यावृत्ति संदिग्ध है जिससे
वह अनेकान्तिक है । नीलादि ज्ञानको बाह्यनिमित्तक मान भी लें तो भी क्यों कभी
नीलज्ञान कभी पीतज्ञान होता है यदि बाह्यनील पीतके सन्निधान-असन्निधानमे यह
व्यवस्था कही जाय तो भी प्रश्न होगा कि पीत सन्निधानमें भी नीलज्ञान क्यो नहीं
होता, पीत ही ज्ञान क्यो होता है । यदि कहें कि पीतमें नीलज्ञानजननकी सामर्थ्य
नहीं है तो भी प्रश्न होगा कि यह सामर्थ्य-असामर्थ्यका भेद कैसे होता है । यदि
हेतुभेदसे कहा जाय तो इसी तरह क्षणों ( क्षणिक आलय विज्ञानों ) में भी स्वकारण
भेदके कारण शक्ति भेद हो ही सकता है संतानीक्षण ही कार्य भेदके हेतु होंगे, वे
प्रति कार्य भिन्न ही होते हैं । मतान नामकी कोई एक वस्तु क्षणोंकी उत्पादिका नहीं
होती जिसके अभेदसे क्षण भेदमें बाधा पड सके ।
जो यह कहा जाता है कि आलय-विज्ञान क्षणोंमें स्वस्वहेतु वैचित्र्यसे सामर्थ्य
भेद होनेपर भी एक मतानस्थ होनेके कारण सबमें एक ही प्रकारकी सामर्थ्य होगी
वह इसलिये ठीक नहीं कि यह कहा ही जा चुका है कि मतानके अभेद होनेपर भी
क्षणोंमें सामर्थ्यभेद है । सौत्रान्तिकका कहना है कि क्षणके भेदा-भेदसे शक्तिका
भेदा-भेद नहीं हो सकता । क्योंकि भिन्न क्षणोंमें भी एक सामर्थ्यकी उपलब्धि होती
है । अन्यथा यदि एक ही क्षण नीलज्ञान जनन समर्थ हो तो पुन. कभी भी नील-
ज्ञानोंकी उत्पत्ति नहीं होनी चाहिये । क्योंकि इस दृष्टिमे जो समर्थ क्षण था वह
व्यतीत हो चुका और क्षणान्तरोंमें नीलज्ञानजनन सामर्थ्य है ही नहीं, इसलिये क्षण
भेदसे सामर्थ्य भेद होता है यह पक्ष उचित नहीं । एक ज्ञान मतानमें अनेकों बार
नीलज्ञान होता ही है किंतु मनान भेदसे ही सामर्थ्य भेद होता है । अतः आलय
विज्ञान संतानोंसे भिन्न बाह्य नीलादि संतानोंसे नीलादि प्रवृत्तिविज्ञानोंका उत्पन्न होना
सगत होता है । इस दृष्टिसे बाह्यार्थ सिद्ध होता है परंतु यह भी ठीक नहीं । क्योंकि
यदि भिन्न संतानोंमें सामर्थ्यभेद मान्य होगा तो यह भी कहना पड़ेगा कि भिन्न
मनानोंमें एक सामर्थ्य नहीं है । ऐसी स्थितिमें विभिन्न नीलसंतानोंमे भी नीलाकारके