मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउपलब्ध होती .है, शून्य बुद्धि नहीं होती । इसलिये तूष्णींस्थितिमें शून्य नहीं
कहा जा सकता । 'उस समय सद्बुद्धि भी न होनेसे सत् भी नहीं रहता', यह भी
नहीं कहा जा सकता, क्योंकि सद्बुद्धि होनेपर भी स्वप्रकाश होनेसे सत् सिद्ध
होता है । निर्मनस्कताका साक्षी स्वप्रकाश होता ही है, जैसे मनकी चञ्चलता
मिटनेपर साक्षी स्वच्छ होता है, उसी प्रकार मायाका विजृम्भण या विकास रुकने-
पर स्वप्रकाश सत् भी स्फुट हो जाता है ।
कुछ लोग आकाशादिसे भिन्न सत् नहीं मानते, परन्तु यह ठीक नहीं है,
क्योंकि 'आकाशः सत् घटः सत्' इत्यादि व्यवहारोंमें जैसे घटादि शब्द एवं घटादि
बुद्धि होती है उसी तरह सत् शब्द एवं सद्बुद्धि होनेसे आकाश और सत्—
दोनों ही पृथक् पदार्थ हैं । जैसे 'मृद् घटः' इस व्यवहारमें शब्द एवं बुद्धिके
कारण ही मृत्तिका और घट दो पदार्थ सिद्ध होते हैं । उनमें मृद्बुद्धिके अनुवृत्त
होनेसे और घट-शरावादि बुद्धिके व्यावृत्त होनेसे मृत्तिका कारण और घटादि कार्य
समझे जाते हैं । उसी तरह सत् अनुवृत्त होनेसे कारण तथा आकाश घटादि
व्यावृत्त होनेसे कार्य सिद्ध होते हैं । अधिक वृत्ति होनेसे सत् धर्मी है, अल्पवृत्ति
होनेसे आकाशादि धर्म हैं । बुद्धिसे यदि आकाशसे सत्को पृथक् कर दें तब तो
आकाश असत् ही हो जाता है । जैसे जाति-व्यक्ति और देह-देहीका भेद होता
है, वैसे ही आकाशादि प्रपञ्च एवं सत्का भी भेद सिद्ध होता है । सावधानी
एवं एकाग्रतासे विचार करनेपर भेद-ज्ञान स्थिर हो जाता है । विवेचन करनेपर
सत् शून्य अवकाशात्मक आकाश रह जाता है एवं निरवकाशात्मक सत् रह
जाता है—
येनेक्षते शृणोतीदं जिघ्रति व्याकरोति च ।
स्वाद्वस्वादू विजानाति तत्प्रज्ञानमुदीरितम् ॥
( पञ्चदशी, महावाक्यविवेकप्र० १ )
जिस नेत्रजन्यवृत्त्यवच्छिन्न चैतन्यसे पुरुष रूपको देखता है, श्रोत्रजन्य
शब्दाकारवृत्त्यवच्छिन्न चैतन्यसे शब्द ग्रहण करता है, गन्धाकारवृत्तिव्यक्त
चैतन्यसे गन्ध ग्रहण होता है, वही बोधस्वरूप चैतन्य प्रज्ञान है—'न हि द्रष्टु-
र्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते ।' ( बृहदा० उप० ४ । ३ । २३ ) द्रष्टाकी स्वरूपभूत
दृष्टिका कभी भी विलोप नहीं होता ।
जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्तिकी सभी वस्तुएँ अपने-अपने स्थानपर ही रहती हैं; किंतु
द्रष्टा तीनों ही अवस्थामें रहता है । जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्तिके प्रपञ्चका जो प्रकाशक भान
है, वही ब्रह्म है । तीनो अवस्थाओका भासक साक्षी भोग्य-भोक्ता और भोग—
तीनोंसे ही विलक्षण होता है । वह चिन्मात्र ही है । चिदाभास एव अहंका
भी सुषुप्तिमें विलय होता है उसका भी साक्षीसे ही प्रकाश होता है ।
मा० रा० ४४—