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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 423, कुल 866 में से

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पृष्ठ 423

६६४ मार्क्सवाद और रामराज्य

तो शशशृङ्गादिका भी अस्तित्व मानना पड़ेगा। अतः यही कहना ठीक है कि
सुषुप्तिमें विशेषानुभवका ही अभाव था। चैतन्यरूप सामान्यानुभवका अभाव
नहीं कहा जा सकता है।
इसी तरह यह भी शङ्का होती है कि 'जहाँ भी कहीं संविद्, ज्ञान या
अनुभव होता है साश्रय ही होता है, निराश्रयज्ञान कहीं भी नहीं देखा गया।
संविद्को आत्माके आश्रित मानना ठीक है; क्योंकि संविद् या ज्ञान एक क्रिया
ही है। क्रिया कर्ताके आश्रित होती है, अतः आत्मा कर्ता है, तदाश्रित संविद्का
होना ठीक है।' परंतु यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि आत्मा स्वयं निष्क्रिय
होनेसे अकर्ता है और संविद् भी वृत्तिसे अभिव्यक्त फल है, क्रिया नहीं। आत्मा
ही संविद् है, संविद् ही आत्मा है। इस तरह संविद् ही सबका आश्रय है, वही
सर्वाधिष्ठान है, वह किसीके भी आश्रित नहीं है। कहा जा सकता है कि 'आत्मा
तो अनुभविता है, फिर वह अनुभवरूप कैसे होगा?' परंतु यह ठीक नहीं।
जैसे प्रकाशस्वरूप सविता ही प्रकाशक भी कहा जाता है, वैसे ही अनुभवस्वरूप
आत्मामें अनुभविताका भी व्यवहार होता है। कुछ लोग कहते हैं, कि 'ज्ञान-
स्वरूप आत्माके आश्रित रहनेवाले ज्ञानद्रव्यको ही अनुभव कहते हैं, आत्माको
नहीं।' परंतु यह भी ठीक नहीं। यदि आत्मा ज्ञानस्वरूप है, तब 'आत्मा
ज्ञान नहीं है' यह कहना असङ्गत है। यदि आत्माके स्वरूपभूत ज्ञानसे ही सब
काम चल जाता है, तो तदाश्रित अलग ज्ञानद्रव्य मानना व्यर्थ है। इसमें गौरव
भी है और कोई प्रमाण भी नहीं है। यदि ज्ञानमें भी अन्य ज्ञान होगा, तो फिर
उस ज्ञानमें भी ज्ञानान्तर कहना पड़ेगा। इस तरह अनवस्था होगी। यदि आत्मा
ज्ञानरूपी द्रव्य है, तो तदाश्रित ज्ञानरूपी अन्य द्रव्य मानना व्यर्थ भी है। अनवस्था,
गौरवादि दोषोंसे दुष्ट भी है। यदि आत्माको द्रव्य न माना जाय, तो आत्माको
सगुण माननेवालोंका पक्ष बाधित होगा। सुषुप्तिमें भी 'मैंने कुछ नहीं जाना,
सुखपूर्वक सो रहा था' इत्यादि स्मरणोंके बलसे अज्ञान एवं सुखका अनुभव रहता
ही है। अतः सुप्तिमें चैतन्यरूप या वृत्तिरूप ज्ञानका अभाव सिद्ध नहीं हो सकता।
चैतन्य एवं अविद्यावृत्तिका अस्तित्व स्मरणबलसे स्पष्ट सिद्ध है। विशेषानुभावाभाव
अवश्य मान्य है।
कहा जाता है कि 'सुप्तिमें अन्तःकरण नहीं होता, विषय भी नहीं रहता
तब विषयाकारपरिणत अन्तःकरणकी वृत्तिरूप ज्ञान कैसे हो सकता है?' परंतु यह
भी ठीक नहीं है; क्योंकि यद्यपि अन्य विषय न भी हो, तो भी सुख एवं
अज्ञानरूप विषय होनेसे तदाकारपरिणत अविद्यावृत्ति हो सकती है। कहा जा
सकता है कि 'सुषुप्तिमें फिर तो ज्ञान भी सविशेष ही हो गया। फिर निर्विशेष
ज्ञानकी सिद्धि कैसे हो सकती है ?' परंतु यह भी ठीक नहीं, क्योंकि सुप्तिमें