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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 417

६५८ मार्क्सवाद और रामराज्य
मैं उत्पत्तिके पहले नहीं था, वैसे चैतन्य यह अनुभव नहीं करता कि मैं उत्पत्तिके
पहले नहीं था । अतः उसकी उत्पत्ति एवं प्रागभाव कथमपि गृहीत नहीं होते ।
फिर भी कहा जाता है कि 'मै नहीं था' इस तरह आत्मा अपने प्रागभावका अनुभव
करता है और यदि आत्मा अनुभवरूप ही है तब तो उसका प्रागभाव सिद्ध हो
गया ।' पर यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि देहतादात्म्य ( अभेद ) के अध्याससे
देह-प्रागभावको ही आत्मप्रागभाव भ्रान्तिवश समझ लिया जाता है। वस्तुतः आत्मप्राग-
भाव अनुभूत नहीं होता । कहा जाता है कि 'मै सर्वदा रहा हूँ' इस प्रकार भी अनुभव नहीं
जानता ।' परंतु यह ठीक नहीं है, क्योंकि अनुभवस्वरूप विद्वान् आत्मा अवश्य
अनुभव करता है कि मै सर्वदा रहा हूँ । फिर भी कहा जाता है कि 'सृष्टिके पहले
जीव आदि नहीं थे, केवल ईश्वर था । 'भागवत' का कहना है—'अहमेवासमेवाग्रे
नान्यद्यत्सदसत्परम्' (२।९।३२) अर्थात् सृष्टिके पहले मैं ही था, अन्य सत्, असत्
कुछ भी न था। पर यह कहना भी ठीक नहीं है; क्योकि सिद्धान्तमें जीव-ईश्वरकी एकता
ही है, अतः ईश्वरकी नित्यतासे तदभिन्न जीवकी भी नित्यता सिद्ध हो जाती है ।
इसीलिये 'अजो नित्यः शाश्वतोऽयम्' ( कठोप० १।२।१८) इत्यादि श्रुतियोंसे
जीवात्माकी नित्यताका प्रतिपादन होता है। इस तरह अनुभव ही प्रत्यक् ब्रह्म है, उसका
प्रागभावादि सिद्ध नहीं होता । यह स्वयंप्रकाशत्व, नित्यत्वादि अजन्य नित्यज्ञानका
ही है। वृत्तिरूप इन्द्रिय-संनिकर्षादिजन्य ज्ञानके सम्बन्धमें यह बात नहीं है।
कुछ लोग कहते हैं कि “जैसे पृथ्वी नित्य है, फिर उसके अवस्थाविशेष
घटादि अनित्य हैं, वैसे ही ज्ञानद्रव्यके नित्य होनेपर भी उसके अवस्थाविशेष
स्मृतित्वादि अनित्य होंगे ।” पर यह कहना भी ठीक नहीं, कारण नित्य
वस्तुमें अवस्था नहीं होती । सिद्धान्ततः पृथ्वी आदि भी अनित्य ही हैं। अनित्य
क्षीरादि द्रव्यकी ही क्षीरत्व, दधित्वादि अवस्थाएँ होती हैं, नित्य ज्ञानकी कोई
अवस्था वास्तविक नहीं होती । अवस्था स्वयं विकार है। विकारी वस्तु अनित्य
ही होती है। कहा जाता है कि 'जैसे वेदान्ती घटावच्छिन्न चैतन्यको अनित्य मानता
है, फिर भी उसे शुद्ध चैतन्य नित्य मान्य है।' पर यह ठीक नहीं है; क्योंकि वहाँ
भी चैतन्य नित्य ही है, किंतु घटकी अनित्यतामे तदवच्छिन्न चैतन्यमें अनित्यताका
व्यवहार होता है। यदि उसी तरह ज्ञानकी नित्यता एवं स्मृति, प्रमा आदिकी
अनित्यता जडवादीको भी मान्य हो, तब तो ठीक ही है।
कुछ लोग कहते हैं कि 'स्वयंप्रकाशत्व, नित्यत्वका सामानाधिकरण्य नहीं
होता । स्वयंप्रकाश भी दीपादि अनित्य होता है । आकाश, कालादि स्वयंप्रकाश न
होनेपर भी नित्य होते हैं।' परंतु यह कथन ठीक नहीं है; क्योकि जो स्वयं
प्रकाश नहीं, वह स्वतःसिद्ध भी नहीं होता । जो स्वतःसिद्ध नहीं है, वह नित्य
भी नहीं होता । काल, आकाश आदि भी अनित्य ही है। दीपादिको स्वयं-