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सर्वकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 409, कुल 866 में से

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पृष्ठ 409

६५० मार्क्सवाद और रामराज्य

श्रुतिके अनुसार ब्रह्म जड नहीं है; क्योंकि 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' यह श्रुति
ब्रह्मको ज्ञानरूप कहती है ।
यह भी विचारणीय है कि यदि संवित् प्रमेय है, तब तो प्रमेयविषयक प्रमा
फलरूप संवित् अन्य होनी चाहिये । परंतु दो संवित्का उपलम्भ नहीं होता ।
यदि कहा जाय कि यद्यपि अन्य संवित्का उपलम्भ नहीं होता तथापि व्यवहारलिङ्गसे
उसका अनुमान किया जायगा, तो यह ठीक नहीं, क्योंकि फलरूप संवित् तो स्वप्रकाश
होती है, फिर उसके अनुमानकी बात कैसे चल सकती है ? कहा जाता है कि जैसे 'अयं
घट:' इस व्यवसायज्ञानका-प्रकाशक 'घटज्ञानवानहं' यह अनुव्यवसायज्ञान
होता है, वैसे ही आत्मामें भी संवित् एवं तद्विषयक संवित् इस तरह दो संवित्
मान्य हैं । परंतु यह कहना असङ्गत है, क्योंकि यह प्रतीतिसे पराहत है अर्थात् दो
संवित्की प्रतीति नहीं होती । जैसे घटादिविषयक संवित् होती है, वैसे
संविद्विषयक संवित्की प्रतीति नहीं होती ।
कुछ लोग कहते हैं कि आत्मा द्रव्य एवं बोधस्वरूप है, अतः आत्मा
द्रव्यरूपसे प्रमेय है और बोधरूपसे प्रमाता । इस तरह एकहीमें ग्राह्यता-ग्राहकता
दोनों ही बन सकती है ।' परंतु इस मतमें भी आत्मा अहंधीगम्य नहीं हो सकता ।
यदि द्रव्यांश अहंबुद्धि है, तो अन्योन्याश्रय दोष होगा; क्योंकि जैसे भासमान ही
दीप घटादिका प्रकाशक होता है, वैसे ही भासमान ही बुद्धि किसीका साधक हो
सकती है । अतः उसके प्रकाशके लिये बोध आवश्यक होगा । तदर्थ आत्माके
ज्ञाततारूप लिङ्गसे अहंबुद्धिका अनुमान करना पडेगा । लिङ्गज्ञानमें ज्ञातताविशिष्ट
आत्माका भी ज्ञान हो जायगा । तथा च आत्माके ज्ञानमें अहंबुद्धि होगी एवं अहंबुद्धिसे
आत्माका ज्ञान होगा । यदि अहंबुद्धि बोधांश ही है, तो अन्तःकरणरूप उपाधिसे
बोध ही अहंबुद्धि भी है और उसीसे सर्वव्यवहार उपपन्न हो सकता है, फिर
द्रव्यांशका अङ्गीकार करना व्यर्थ है । फिर भी कहा जाता है कि 'यदि बोध
स्वप्रकाश ही है, तो वेदान्तोंका क्या प्रयोजन रहेगा ?' परंतु इसका समाधान
यही है कि उसी बोधका अनुवाद करके उसे ब्रह्मरूप समझाना ही वेदान्तोंका
प्रयोजन है । उस अखण्ड स्वप्रकाश बोधसे प्रत्यक्षानुमानागमादि प्रमाण एवं
जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति, समाधि, मूर्च्छा-अवस्था स्वतः सत्तास्फूर्तिरहित होनेपर
भी प्रकाशित होते हैं। इसी तरह निखिल प्रपञ्च जिस बोधके प्रसादसे सत्ता-
स्फूर्तिवाला होकर भासमान होता है, जो स्वयं स्वमहिमस्थ एवं स्वप्रकाश-
बोध है, वही ब्रह्मात्मा है। जो स्वयं अन्यार्थ नहीं है और सब कुछ जिसके लिये है, वही
निरतिशय पर-प्रेमका आस्पद आत्मा एव आनन्दस्वरूप बोध ही सब कुछ है; अर्थात् सब
कुछ उसीमें अध्यस्त है। भावाभावात्मक सभी पदार्थ जिसका आश्रय करते हैं, प्रमाता,
प्रमाण, प्रमेय आदि परस्पर विलक्षण अविद्याकार्यस्वरूप जगत् जिसमें प्रतिभासित
होता है, वही सर्वविकारशून्य, सर्वसाक्षी अखण्ड बोध ब्रह्म है ।