मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनहीं होता। प्रतियोगीका प्रत्यक्ष हुए बिना प्रतियोगी-विशिष्ट भेदका प्रत्यक्ष नहीं
होता। प्रत्यक्षायोग्य प्रतियोगीका प्रतिभान भ्रान्तिरूप ही है। फिर उसी ज्ञानमें
भासित भेद एव भेदविशिष्ट घटादि भी उसी भ्रममें भासित होते हैं, अतः निर्विशेष
सन्मात्र ही भासित होते हैं।
अनुभव और आत्मा
'वार्तिककार' में संवित्के सम्बन्धमे महत्त्वपूर्ण बातें कही गयी हैं।
संवित्का भेद स्वतः नहीं कहा जा सकता। घटसंवित्, पटसंवित् इस रूपसे वेद्य-
पूर्वक ही संवित्का भेद भासित होता है, अतः संवित्का यह भेद स्वाभाविक नहीं,
किंतु घटादि उपाधिके कारण ही प्रतीत होता है। वह सुतरां भ्रम है। इसी
प्रकार सम्यक् ज्ञान, सशय एव मिथ्याज्ञान इत्यादि भेद भी संवित्के स्वाभाविक
नहीं हैं; क्योंकि ये भेद बुद्धिगत हैं। चिद्रूप संवित् तो सम्यक्, सशय, मिथ्या
आदि सभी ज्ञानोंमें समान है, क्योंकि बाध न होनेसे रज्जु-सर्पका भी स्फुरण मिथ्या
नहीं। यदि स्फूर्तिका बाध हो, तब तो रज्जुतत्त्वका भी स्फुरण कैसे हो सकेगा ?
यदि कहा जाय कि रज्जुस्फूर्ति सर्पस्फूर्तिसे पृथक् है, तो यह भी ठीक नहीं क्योंकि
ऐसी स्थितिमें दो स्फूर्तियोंमें स्फूर्ति शब्दका प्रयोग कैसे होगा ? कहा जा सकता
है कि स्फूर्तित्व-जातिके अनुगमसे ही दोनोंमें स्फूर्ति शब्दका प्रयोग हो सकेगा।
परंतु वेदान्तमतानुसार व्यक्ति-जातिके स्थानमें व्यावृत्त एवं अनुवृत्त शब्दका प्रयोग
होता है। तदनुसार यहाँ चित् अनुवृत्त है, बुद्धि व्यावृत्त है। तथा च सर्पबुद्धि,
रज्जुबुद्धियोंकी परस्पर व्यावृत्ति होनेपर भी चित् या स्फूर्ति उभयत्र अनुगत है।
उसीको कोई जाति कह लेते हैं। गोत्वादिमे भी यही न्याय लागू हो सकता है।
सर्वत्र अनुगत ब्रह्म ही गोत्वादि जाति है। व्यावृत्त व्यक्ति मायिक है। इस तरह
सम्यक्, सशय, मिथ्या आदि विभिन्न आकारवाली बुद्धि है। इसी तरह प्रमाता-
प्रमाणादिका भी भेद है। जैसे घटादिका भेद है, वैसे ही सम्यक्त्वादि और
प्रमात्रादिमे भी भेद है। परंतु यह भेद कल्पित है। इन्हीं कल्पित भेदोंसे संवित्-
का भेद भी कल्पित होता है। वस्तुतः प्रत्यक्स्वरूप संवित् स्वतःसिद्ध है और
एक है। उसीके आधारपर भावाभाव सब व्यवहार चलता है।
बोध, अनुभव, संवित् आदि शब्दोंसे वही परब्रह्म आत्मा कहा जाता है।
अनुभवरूप संवित्से ही अहंप्रत्ययकी भी सिद्धि होती है। जो लोग अहंप्रत्ययसे
आत्मसिद्धि मानते हैं, उनके यहाँ भी अहप्रत्ययसिद्धिके लिये अनुभवरूप आत्माकी
अपेक्षा रहेगी ही इस तरह अन्योन्याश्रय दोष होगा। जो अहंधीको स्वप्रकाश
एव आत्माको जड कहते हैं, उनका केवल भाषाका ही भेद है। स्वप्रकाशसे ही
जड़की सिद्धि होती है। इस सम्बन्धमें उनका तथा वेदान्तीका ऐकमत्य ही है।