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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 384, कुल 866 में से

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पृष्ठ 384

दोषकी प्रसक्ति होती है। कुछ लोगोंका कहना है कि 'चक्षुरादि साधनोंकी अर्थ-
वत्ताके लिये उत्तर संवित्का जन्म मानना आवश्यक है और एक कालमें दो
संवित् नहीं रह सकतीं, अतः पूर्व संवित्का विनाश भी मानना चाहिये।' परंतु
यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि एक ही संवित्के भिन्न-भिन्न विषयोंके साथ होनेवाले
सम्बन्धोंके ही उत्पत्ति-विनाशसे साधनोंकी सार्थकता एवं यौगपद्य (एककालिकता)
की निवृत्ति बन जायगी।
बौद्धोंका कहना है कि 'संविदोंमें भेद रहता हुआ भी सादृश्यके कारण
प्रतीत नहीं होता। नील-पीतादि विषयरूप उपाधिके संसर्गसे ही वह भेद प्रतीत
होता है।' परंतु यह कथन भी ठीक नहीं, क्योंकि ज्वालाएँ अन्यवेद्य हैं, उनमें
भेदकी अप्रतीति हो सकती है, परंतु स्वप्रकाश संवित्में होनेवाले भेदकी अप्रतीति
नहीं बन सकती। कहा जा सकता है कि 'जैसे वेदान्तियोंका स्वप्रकाश भी ब्रह्म
अज्ञात रह सकता है, वैसे ही संवित्का भेद भी अप्रतीत रह सकता है।' परंतु
यह भी ठीक नहीं है। ब्रह्ममें अविद्याका आवरण प्रमाणसिद्ध है, अतः एक ही
संवित् अनादि है, क्योंकि उसका प्रागभाव नहीं है। सुरेश्वराचार्यका कहना है कि
प्रत्येक कार्य प्रागभावपूर्वक ही होता है। उस प्रागभावकी भी सिद्धि संवित्से ही होती
है, अतः संवित्का प्रागभाव नहीं है। यदि संवित् न हो तो प्रागभाव ही सिद्ध
नहीं हो सकता और जब संवित् है ही, तब उसका प्रागभाव कैसे कहा जा सकता है?
'कार्यं सर्वैरयतो दृष्टं प्रागभावपुरस्सरम् । तस्यापि संवित्साक्षित्वात् प्रागभावो न
संविदः ॥' इस तरह स्वप्रकाशानुभव नित्य है, वही आत्मा भी है। आत्मा ही
विषयोपाधिक होकर अनुभव कहलाता है। विषयोपाधिकी विवक्षा न होनेसे वही
अनुभव आत्मा कहलाता है। जैसे वृक्ष ही समूहरूप उपाधिके कारण वन कहलाते
हैं और उपाधि-विवक्षा न होनेसे वे ही वृक्ष कहलाते हैं। अतः प्रभाकरका यह
कहना ठीक नहीं है कि 'अनुभवके आश्रयरूपसे आत्माका प्रकाश होता है।'
कहा जाता है कि 'घटमहं पश्यामि' यहाँ अहंकार ही घटका द्रष्टा है वही
आत्मा है।' परंतु यह ठीक नहीं है। यदि 'अहं' ही आत्मा है, तब तो सुषुप्तिमें
भी उसका स्फुरण होना चाहिये। परंतु सुषुप्तिमें अहं‌की प्रतीति नहीं होती, अतः
अहंकार आत्मा नहीं है। कुछ लोग कहते हैं कि 'सुषुप्तिमें विषयानुभव नहीं
होता, अतः अहंकारकी भी प्रतीति नहीं होती।' यह कहना भी ठीक नहीं है।
यहाँ यह विचारणीय है कि 'क्या सुषुप्तिमें अनुभव ही नहीं है अथवा विषय-
सम्बन्धका ही अभाव है?' पहला पक्ष ठीक नहीं है, क्योंकि अनुभव नित्य है,
अतः उसका अभाव नहीं कहा जा सकता। दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं है, क्योंकि
विषय सम्बन्ध आत्मप्रतीतिका कारण नहीं है । कहा जाता है कि 'आत्मा का
द्रष्टृत्वरूप आकार ही अहंकार है, द्रष्टृत्वकी प्रतीतिमें विषय सम्बन्ध आवश्यक
मा० रा० ४०—