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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 381

६२२ मार्क्सवाद और रामराज्य
है। कोई भी प्रतीति स्वसत्ताकालमें प्रकाशहीन नहीं होती, अतएव घटादिके तुल्य
उसे अवेद्य नहीं कहा जा सकता ।
कुछ लोगोंका कहना है कि 'जैसे घटादिरूप वेद्य होता है, वैसे ही प्रमाण-
रूप आत्मव्यापारसे जायमान घटादिनिष्ठ प्राकट्य भी वेद्य हो सकता है।' यहाँ
भी प्रश्न होता है कि 'वह आत्मव्यापार क्या है, परिस्पन्द या परिणाम ?' प्रथम
पक्ष इसलिये मान्य नहीं कि सर्वगत आत्मामें परिस्पन्द नहीं हो सकता । दूसरा
पक्ष भी ठीक नहीं है, क्योंकि मृत्तिकाका परिणामभूत घट जैसे मृत्तिकामें ही
रहता है, वैसे ही आत्म-परिणामभूत ज्ञान आत्मामें ही रहना चाहिये, उसकी विषय-
निष्ठता नहीं हो सकती । कहा जाता है कि 'बालोंके पकने (श्वेत होने)
रूप परिणामसे जैसे शरीरमें वार्धक्य होता है, वैसे ही आत्मपरिणामसे विषयमें
ज्ञानका प्राकट्य होता है।' इसपर भी विचारणीय यह है कि 'प्राकट्यका जो
आश्रय है वह चेतन है या प्राकट्यका जो जनक है, वह चेतन है,
अथवा प्राकट्यजनक ज्ञानाख्य व्यापारका आधार ही चेतन है ?' यदि
पहला पक्ष है, तब तो घटादि विषयको चेतन होना चाहिये; क्योंकि विषय ही
प्राकट्यका आश्रय है। दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं है; क्योंकि चक्षुरादि भी प्राकट्यके
जनक हैं; अतः वे ही चेतन कहे जायँगे । तीसरा पक्ष भी ठीक नहीं है; क्योंकि
'भोजनक्रियाजन्य तृप्ति-फल-सम्बन्धी देवदत्तके समान आत्मा ज्ञानक्रियाजन्य-फल-
सम्बन्धी होनेसे ज्ञानक्रियावान् है', इत्यादि अनुमानके आधारपर आत्माकी ज्ञाना-
धारताका अनुमान करना पड़ेगा । परंतु आत्मामें फल-सम्बन्धका अभाव होनेसे
हेतु असिद्ध है; क्योंकि प्राकट्यरूप फल विषयमें ही रहता है, आत्मामें नहीं ।
अतएव तार्किकों और भाट्टोंका मत ग्रहण न करके प्रमातृव्यापारप्रमाण एव
प्रमाणफल-प्रमितिको स्वप्रकाश ही मानना उचित है । बौद्ध संवेदन (अनुभव)
को ही प्रमाण और उसे ही प्रमाणफल मानते हैं । परंतु इस पक्षमे वही प्रमाण
और वही प्रमाणफल होनेसे कर्म-कर्त्तृ-विरोध स्पष्ट ही है।
कहा जाता है कि 'यद्यपि प्रमाता आत्माका कोई व्यापार नहीं है, तथापि
आत्मा, मन, चक्षु एवं विषयोंका संनिकर्ष ही प्रमाणरूप होकर प्रमातृव्यापार-
रूपसे उपचरित होता है । प्रमाणफल तो अव्यभिचारतरूपसे प्रमिति ही है। हान,
उपादान, उपेक्षा व्यभिचरित होनेवाले हैं, अतः उन्हें प्रमाणफल नहीं कहा जा
सकता।' इस तरह प्रभाकरका मत है कि 'स्वप्रकाश विषयसंवेदनके आश्रयरूपसे
प्रदीपाश्रय-वर्त्तिकाके तुल्य प्रकाशमान अहंकार आत्मा है, दृग् दृश्यका अन्योन्या-
ध्यासरूप अहंकार नहीं।' परंतु वेदान्ती आत्माको अनुभवरूप ही मानते हैं।
यहाँ विचारणीय यह है कि 'क्या आत्मा ही चित्प्रकाश है अथवा आत्मा और
अनुभव—दोनों ही चित्प्रकाश हैं, अथवा केवल अनुभव ही चित्प्रकाश है और आत्मा
जड ही है ?' यदि आत्मा ही चित्प्रकाश है, तो 'क्या अनुभव चक्षुरादिके तुल्य