मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 340, कुल 866 में से
संदर्भ में पढ़ेंसमझकर, अपनी इच्छासे संतान पैदा करे । संतान पैदा करनेके लिये समाजकी
सभी स्त्रियोंके लिये ऐसी परिस्थितियाँ होनी चाहिये, जो स्वयं स्त्री और संतानके
स्वास्थ्यके लिये अनुकूल हों । गर्भावस्था में स्त्रीके लिये इस प्रकारकी परिस्थिति होनी
चाहिये कि वह अपने स्वास्थ्यको ठीक रख सके और स्वस्थ संतानको जन्म दे
सके । परंतु पूँजीवादी-समाजमें साधनहीन तथा पूँजीपति दोनो ही श्रेणियोंके लिये
ऐसी परिस्थितियाँ नहीं हैं । साधनहीन श्रेणीकी स्त्रियोंको गर्भावस्था में उचितसे
अधिक परिश्रम करना पड़ता है और पूँजीवादी श्रेणीकी स्त्रियाँ बिलकुल निष्क्रिय
रहनेके कारण जैसी संतान पैदा करना चाहिये, वैसी नहीं कर पातीं ।
'समाजवादी और समष्टिवादी-समाजमें स्त्री भी समाजका परिश्रम या
पैदावार करनेवाला अङ्ग समझी जाती है। उसे केवल पुरुषके भोग और रिझावका
साधन नहीं समझा जाता । 'मार्क्सवाद' मनुष्यमें आनन्द, विनोद और
रिझावकी जगह भी स्वीकार करता है, परंतु उसमें पुरुषको प्रधान बनाकर स्त्रीको
केवल साधन बना देना उसे स्वीकार नहीं । पूँजीवादी-समाजमें स्त्री अपने माता
बननेके कार्यके कारण पुरुषके सामने आत्मसमर्पण करनेके लिये मजबूर होती है
( क्योंकि पुरुष जीविका कमाकर लाता है ) । समाजवाद और समष्टिवादमें स्त्रीके
गर्भवती होने, प्रसवकाल और उसके बाद जबतक वह फिर परिश्रमके काममें भाग
लेनेके योग्य न हो जाय, स्त्रीकी आवश्यकताओंकी पूर्ति और स्वास्थ्यकी देख-भालकी
जिम्मेदारी समाजपर होगी । प्रसवसे दो-ढाई मास पूर्वसे लेकर प्रसवके एक मास
पश्चात्तक वह समाजके खर्चपर रहेगी । संतान पैदा होनेके बाद समाज जो
काम उसे करनेके लिये देगा, उसमें बच्चेकी देख-भालका समय और सुविधा भी
उसे देगा । बच्चेके पालने-पोसने और शिक्षाकी जिम्मेदारी भी गरीब स्त्रीके ही कंधों-
पर न होकर समाजके सिर होगी । इस प्रकार संतान पैदा करना स्त्रीके लिये भय
और मुसीबतका कारण न होकर उत्साह और प्रसन्नताका विषय होगा ।'
उपर्युक्त मार्क्सवादी मन्तव्यसे यह स्पष्ट है कि मार्क्सवादियोंको स्त्री-हितसे
उतना प्रयोजन नहीं है, जितना कि स्त्रीको अपने पति पुत्रादि परिवारसे विच्छिन्न
कर उसे समाजकी वस्तु बनानेसे है । स्पष्ट है कि पतिको अपनी पत्नीमें
जितनी प्रीति है, पुत्रको अपनी मातामें जितना स्नेह है, उतनी प्रीति, उतना स्नेह
समाजकी साधारण वस्तुमें समाजका क्यों होगा ? जेलो एव अनाथालयोंमें भी
स्त्रियो-पुरुषोंको भोजन मिलता है, वस्त्र मिलते हैं, इलाज मिलता है और गर्भ
तथा प्रसवकालमे बहुत सी सुविधाएँ भी मिलती हैं । परंतु क्या स्वाधीनतापूर्वक
गरीबी हालतके भी जीवनका सुख उपर्युक्त स्थितिमे सम्भव है ? पति, सास-ससुर,
देवर-जेठ, पुत्र-पौत्र आदिके सहज सम्बन्ध और स्नेहकी तुलना समाजमें कहाँ
प्राप्त हो सकती है ? रामराज्य-प्रणालीमें स्त्री गृहलक्ष्मी रहेगी । वेदोंने विवाहके