मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस्वतन्त्रता, आत्मनिर्णयका अधिकार आदि मोहक नामोंसे स्त्रियोंको बरगला-
कर अपना शिकार बनाना और उन्हें मजदूरी या वेश्यावृत्ति करनेके लिये निराश्रय
एवं असहाय छोड़ देना उनके साथ घोर अन्याय करना है । पुरुष जब सहर्ष
अपनी कमाई स्त्रियोंको खर्च करनेके लिये समर्पण करता है, तब उन्हें भी कमानेके
काममें लगानेका अर्थ ही क्या है ? इसके अतिरिक्त गृहका कार्य भी कुछ कम
नहीं है । यदि गृहिणी सुप्रबन्ध करनेवाली गृहलक्ष्मी न हो तो पुरुषके लाखो
कमानेपर भी घरमें बरकत नहीं होती । मानव-जीवन और गृहको सरस एव
माङ्गलिक बनानेवाली स्त्रीके सिरपर कमानेका भार न होना ही अच्छा है । स्त्री-
द्वारा उत्पादित रामचन्द्र, हरिश्चन्द्र, प्रह्लाद, ध्रुव, शिवि, दिलीप, भगीरथ-जैसी
एक भी सतान समष्टि व्यष्टि जगत्के लोक-परलोकका जीवन माङ्गलिक एव समुन्नत
बना सकती है । उपयोगितावादी स्मिथ तो धर्म, संस्कृति, प्रेम, सौन्दर्य, कला,
क्षमा, दया, त्याग आदि सभी उदात्त गुणोंमें उपयोगिता ही ढूँढता है । लोक-
कल्याणार्थ अपने प्राणतकको बलिदान कर देनेमें स्मिथको कुछ भी उपयोगिता
नहीं दिखायी दे सकती, परन्तु क्या इतनेसे ही यह त्याग व्यर्थ कहा जा सकता
है ? ससारमें उपयोगिता ही सब कुछ नहीं है । माता, भगिनी, पुत्री, पत्नी-
का महत्त्व उपयोगिताकी कसौटीपर नहीं परखा जा सकता ।
वर्गवाद
मार्क्सके मतसे 'भारतमें औद्योगिक विकाससे होनेवाला परिवर्तन यूरोपके
प्रभावसे देरमें आरम्भ हुआ बल्कि अभी शनैः-शनैः हो रहा है और पूरे रूपमें हो भी
नही पाया, स्त्रियोंकी अवस्थामें भी परिवर्तन अभीतक यहाँ नहीं हो पाया है । जन-
साधारण या जमींदार-श्रेणी और पूँजीपति-श्रेणीकी स्त्रियाँ इस देशमें अभीतक
उसी अवस्थामें हैं, परन्तु मध्यम श्रेणीकी स्त्रियोंकी अवस्थामें - जिनपर आर्थिक
परिवर्तनका प्रभाव गहरा पड़ा है, परिवर्तन तेजीसे आ रहा है ।
'यूरोपमें जहाँ पूँजीवाद पूर्ण उन्नति कर चुकनेके बाद ठोकरें खाने लगा है,
स्त्रियोंकी अवस्था पुरुषोंकी अपेक्षा जीवन-निर्वाहके सङ्घर्षमें कम योग्य होनेके कारण
पुरुषोंसे भी गयी-बीती है । बेकारी और जीवन-निर्वाहकी तंगीके कारण लोग व्याह-
कर परिवार पालनेके झगड़ेमें नहीं फँसना चाहते, इसलिये स्त्रियोंके लिये घर
बैठकर बच्चे पालने और निर्वाहके लिये रोटी-कपड़ा पाते रहनेका भी मौका गया ।
अब उन्हे भी मिलो, कारखानों, खानो, खेतों और दफ्तरोंमें मजदूरी कर पेट पालना
पड़ता है । यदि उनका विवाह हो जाता है तो माता बननेका उनका काम ज्यो-
त्यों निभ जाता है और वे फिर मजदूरी करने चल देती हैं । यदि विवाह नहीं हुआ
और शरीरकी स्वाभाविक प्रवृत्तिके कारण वे माता बन गयीं तो उनकी मुसीबत
है । प्रसवकी अवस्थामें उनके निर्वाहका सवाल बहुत कठिन हो जाता है और
प्रसवकालमें ही उन्हे सहायताकी अधिक आवश्यकता रहती है । प्रसवकालमें यदि