मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमस्तिष्क एव देहोका निर्माण नहीं किया । जैसे इन प्राकृतिक साधनोसे मनुष्य
लाभ उठाता है, वैसे ही अन्य प्राकृतिक साधनोसे दूसरोको भी लाभ उठानेका
अधिकार है । मशीनो, कल-कारखानोके विस्तारसे उत्पादनमें वृद्धि, वस्तुओकी
बहुलतासे दाममे कमी होना, कम मजदूरोका उपयोग, अधिकोकी बेकारी आदिका
होना तो अनिवार्य है । परंतु बच्चो एव स्त्रियोसे काम लेना, चार घंटेके बदले
मजदूरोसे बारह घंटे काम लेना, कम मजदूरी देना और उन्हे असहाय छोड़
देना आदि जुर्म है । यह कहीं भी हो, इसका समर्थन नही किया जा सकता ।
यह सार्वदेशिक एव सार्वकालिक इतिहासकी बात नहीं । अन्यान्य अनाचारोके
समान यह भी शुद्ध उपद्रव ही है, जो सर्वथा हेय है । यह अतिरञ्जित बीभत्स
वर्णन एक वर्गके प्रति घृणा फैलानेके उद्देश्यसे भी हो सकता है । वैसे रूसमें विरो-
धियोके साथ लोग इससे भी अधिक भीषण दुर्व्यवहारकी बात करते है ।
भौतिकवादी ईश्वर एव धर्मके सम्बन्धमे बहुत उलटा प्रचार करते हैं और
कहते हैं कि 'इस पक्षमे सब कुछ ईश्वरकी इच्छासे ही होता है । मनुष्यके विचार
भी ईश्वरप्रेरणाके ही अधीन होते हैं । ईश्वरवादी ससारको मिथ्या मानकर उससे
भागनेके ही फेरमें रहते हैं ।' वे कहते हैं कि 'इतिहास इस पक्षका समर्थन नहीं
करता ।' परंतु ये बाते बहुत ही छिछली हैं । लाखो-करोडों वर्षका इतिहास
वस्तुतः ईश्वरवादका ही समर्थक है । ईश्वरवादियोने ही बडा-बड़ा पुरुषार्थ किया
है । समुद्रमे सौ योजनका पुल ईश्वरवादियोने ही तैयार किया है । अखण्ड भूमण्डल-
का साम्राज्य, पुष्पकविमान-जैसे वायुयान, हाईड्रोजनबमसे करोडो गुना अधिक
शक्तिशाली ब्रह्मास्त्र, पाशुपतास्त्र ईश्वरवादियोने ही प्रकट किये हैं । मनुष्योके अति
रिक्त दिव्य शक्तियोके साथ प्रत्यक्ष व्यवहार भी उन्होने ही किया है । एक देहात्म-
वादी उसी बड़े काममे हाथ लगा सकता है, जिसका फल वह जीवनमें देख सके ।
उसके जीवनमें जिसका फल सम्भव नही, उस काममें वह किस उद्देश्यसे प्रवृत्त
होगा ? परंतु आत्मवादी आत्माको अमर मानता है, वह जानता है कि 'इस जन्ममें
नहीं तो जन्मान्तरमे मेरे प्रयत्नका फल होगा ही ।' वह कोटि-कोटि जन्मतक भी
किसी बडे कामको पूरा करनेका दृढ संकल्प कर सकता है—'जन्म कोटि लगि रगर
हमारी । बरौं संभु न त रहौ कुमारी ॥' कई पीढीके प्रयत्न करनेसे गङ्गाके लानेका
प्रयत्न भी इसी कोटिका था । जैसे अङ्कुरोत्पत्तिमें पर्जन्य साधारण कारण है, अङ्कुरके
रूप, रस, फल आदि विचित्रताका असाधारण कारण पर्जन्य नहीं, किंतु बीजकी
निजी विशेषता है, वैसे ही ईश्वर सर्व प्रवृत्तियोंमे साधारण कारण है । तत्तद्विशिष्ट
फलोंकी प्राप्तिमें प्राणियोंके पुरुषार्थ ही मुख्य कारण हैं । प्राणियोंके अपने पुरुषार्थ-
प्रमादके अनुसार ही सफलता-असफलता चलती है । योगवाशिष्ठ आदिमें
पुरुषार्थका जितना जबर्दस्त समर्थन है, जडवादी कभी भी उतने पुरुषार्थकी
कल्पना नहीं कर सकते ।