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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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२८४ मार्क्सवाद और रामराज्य
नेत्रसे विभिन्न जातीय आम्रोंमें भेद नहीं प्रतीत होते, वृक्ष, शाखा, पत्रादि सबके
समान ही होते हैं तो भी फल एवं रस-गन्धादिकी विलक्षणता प्रमाणसिद्ध है।
अश्वकी विभिन्न जातियोंमे नेत्रसे भेद परिलक्षित न होनेपर भी गुण-धर्म-भेदसे
उनका भेद मान्य होता है। उसी तरह ब्राह्मणादिमें उपरिगत भेद भासित न होने-
पर भी शास्त्रप्रमाणगम्य विभिन्न गुण-धर्मों, रक्तोके भेदसे उनमें भेद मानना
अनिवार्य है। जैसे वैध और जारजात अवैध संतानोंमें उपरी कुछ भी भेद प्रतीत
नहीं होता, तथापि शुद्धि-अशुद्धिका भेद समाजमें मान्य होता है। अनुलोम-प्रतिलोम-
भेदसे साकर्यमें ही पर्याप्त भेद है। जारजातके ललाटमें शृङ्ग नहीं होता, कुलप्रसूतके
हाथमें कमल खिला नहीं होता; किंतु शास्त्रो और उनके गुणोंके आधारपर उनका
परिज्ञान होता है—
न जारजातस्य ललाटशृङ्गं कुलप्रसूतस्य न पाणिपद्मम् ।
यथा यथा मुञ्चति वाक्यजालं तथा तथा तस्य कुलं प्रमाणम् ॥
सामान्यरूपसे नित्य अनेक समवेत धर्म ही जातिपदसे व्यपदिष्ट होता है।
अनेक गोव्यक्तियोंमें समवेत नित्य गोत्व धर्मही जाति है। यह धर्म ही अपने धर्मीको
स्वजातीय-विजातीयसे व्यावर्तन भी कर देता है। गोत्व-धर्म विजातीय घटादि और
सजातीय अश्व-महिषादिसे गोका व्यावर्तन करता है। बहुधा आकृतिभेदसे जाति-
भेदकी मान्यता चलती है। परंतु शास्त्रीय दृष्टिसे आकृतिभेद न रहनेपर भी ब्राह्मण-
क्षत्रियादि वर्णोंमें जातिभेद मान्य होता है। पाणिनिव्याकरणकी दृष्टिसे जाति-अर्थमें
ब्राह्मण और तद्भिन्न अर्थमें ब्राह्म बनता है। 'ब्राह्मोऽजातौ' (६।४।१७३)
ब्राह्मणी आदिमे ङीष् प्रत्यय भी जाति अर्थमें ही होता है—
आकृतिग्रहणा जातिर्लिङ्गानां च न सर्वभाक् ।
सकृदाख्यातनिर्ग्राह्या गोत्रं च चरणैः सह ॥
(महाभाष्य ४।१।६३)
अनुगत संस्थानविशेषसे जातिकी व्यञ्जना होती है। यहाँ आकृतिको उपदेशका
उपलक्षण माना गया है। तथा च ईदृश आकारवाली वस्तु गौ है, इस प्रकारके
उपदेशसे गोत्व जातिका परिज्ञान होता है। कारिकामें कहा गया है कि जो असर्व-
लिङ्गभागी हो और एक वारके उपदेशसे अनुगतरूपेण ग्राह्य हो, वही जाति है। 'ब्राह्मण:'
'वृषलः' आदि शब्द पुल्लिंग, स्त्रीलिङ्ग होनेपर भी नपुंसकलिंग नहीं हैं, इसलिये
इनके अनुगत-संस्थान आकृति अनुपलब्ध होनेपर भी जातिका व्यवहार होता है।
संस्थान व्यंग्य गोत्वादि जाति या उपदेशगम्य ब्राह्मणादि जाति जन्मसे ही होती
है। साथ ही जाति यावद्द्रव्यभावी असर्वलिङ्गभागिनी तथा अनेकानुगत होती है—
आविर्भावविनाशाभ्यां सत्त्वस्य युगपद्गुणैः ।
असर्वलिङ्गां बह्वर्थां तां जातिं कवयो विदुः ॥
(व्या० महाभाष्य ४।१।६३)