मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसाम्राज्ञीके भी अङ्गमें माङ्गल्य सूत्र-मात्र भूषण रह जाता था । यज्ञोंमें सदा
सेवा निरत शूद्रसे मेवा लेकर, व्यापारनिरत वैश्यसे वस्तुएँ खरीदकर, क्षत्रियपर
रक्षाका भार देकर, ब्राह्मणको याजनका कार्यभार देकर सभीको द्रव्य समर्पण
किया जाता था ! याचक अयाचक हो जाते थे । प्रायः सब देनेकी बात सोचते
थे, लेनेकी नहीं । देनेवाले हर ढंगसे देनेका रास्ता खोजते थे ! दूसरे लोग
न लेनेका मार्ग खोजते रहते थे । गाढ़ी कमाईके स्वल्प धनसे भी गुजारा करना
ठीक समझा जाता था । प्रतिग्रहको निन्द्य समझा जाता था । मुफ्तखोरी,
हरामखोरीसे सभी भरसक बचनेका प्रयत्न करते थे । लूट, खसोट, चोरीकी तो
बात कोई सोचता ही न था । दूसरेकी सम्पत्ति, हीरा, रत्न, मणि, अन्नादि
रास्तेमें पड़े हो या अपने घरमें ही कोई क्यों न डाल गया हो, आवश्यकता
होनेपर भी विधिपूर्वक विना पाये लेना अनुचित समझा जाता था—
परान्नं परद्रव्यं वा पथि वा यदि वा गृहे ।
अदत्तं नैव गृह्णीयादेतद् ब्राह्मणलक्षणम् ॥
इधर भौतिकवादमें लेनेवाले हर प्रकारसे मरकर, मारकर भी लेना चाहते
हैं । देनेवाले मर जाना मंजूर करते हैं, पर देना नहीं चाहते । जिसके घरमें
तीन वर्षके लिये कुटुम्ब-पोषणकी सामग्री होती थी, वह शेष धन सोमयज्ञमें अवश्य
खर्च कर देता था । साधारण दीन प्राणी भी अतिथि-सत्कारके लिये सदा लालायित
रहता था । रन्तिदेव आदि तो ४८ दिनके निर्जल व्रतके बाद भी स्वल्प प्राप्त
सामग्रीद्वारा सर्वप्रथम अतिथि-पूजा आवश्यक मानकर प्रवृत्त हुए, ब्राह्मण,
अन्त्यज, पुल्कसको सब कुछ देकर सत्कार किया । मरते-दमतक ईश्वरसे
यही चाहा कि 'मुझे स्वर्ग, अपवर्ग, राज्य आदि कुछ भी न चाहिये । केवल
दुःखी प्राणियोंका दुःख ही मुझे मिले । मेरे शुभकर्मोंसे प्राणियोंको संतोप
हो।' धर्मभावनाकी प्रधानताके कारण ही राजा शिविने कपोतकी रक्षाके लिये
अपने शरीरका मास और अन्तमें अपने आपको देकर कपोतकी रक्षा करनी
चाही थी । राजा दिलीप ने नन्दिनीकी रक्षाके लिये अपनेको सिंहका ग्रास
बनानेका निश्चय कर लिया । इस भावनामें शोषण, उत्पीड़न, विताड़नाकी
कल्पना भी नहीं हो सकती ।
आर्थिक असंतुलन
आर्थिक असंतुलन मिटानेके लिये ही शास्त्रोंमें दानका महत्त्व कहा गया
है । अपनी श्रद्धासे, दूसरोंके उपदेशसे, लज्जासे, भयसे किसी तरह भी देना
परम कल्याणकारी है । शास्त्रोंमें यह भी कहा गया है कि जो धनी होकर
दानी नहीं और निर्धन होकर तपस्वी नहीं, ऐसे लोग गलेमें पत्थर बाँधकर समुद्रमें
डुबा देने योग्य होते हैं—