मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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इसलिये वर्गसङ्घर्ष वर्ग-विद्वेष फैलाकर वर्ग-विध्वंसका प्रयत्न कभी भी आदर्श
वस्तु नहीं है ।
आधुनिक यन्त्रीकरण युगमें भी उत्पादनमें पूँजी और श्रम दोनों
कारण हैं । पूँजी बिना श्रमजीवी कुछ नहीं कर सकते । श्रमजीवी विना
पूँजी भी कुछ नहीं कर सकती । फिर भी श्रमजीवीको जीवनके लिये धन
चाहिये । पूँजीपतिको उत्पादनके लिये श्रम चाहिये, अतः पूँजीपति
धनसे श्रम खरीदता है । इसीलिये वह मजदूरको निश्चित मजदूरी
देकर आयका भागी होता है । कम्यूनिज्ममें भी पूँजीवाद चलता है । भेद
इतना ही है कि पूँजीवादमें अनेक पूँजीपति होते हैं, साम्यवादमें सरकारी पदाधि-
रूढ लोगोंका एक गिरोह ही पूँजीपति होता है और इसके लिये तोड़-फोड़की परम्परा
चलती रहती है । यदि वस्तुतः शासन-परिषद् और मजदूर-अधिनायकोंमें
साधारण मजदूरोसे कोई विशेषता न हो तो फिर सङ्घर्ष क्यों ? फिर ट्राटस्की,
वेरिया आदिका सफाया क्यो ? विरोधी व्यक्ति या समूहको समाप्त कर कुछ
लोगोके ही धाक जमानेका क्या अर्थ है ?
भारतीय शास्त्रोंके अनुसार यद्यपि सब वस्तु सबकी नहीं होती,
इसीलिये भूपति, भूपाल सब नहीं होते । भूमि, सोना, लोहा, ताँबा, पेट्रोल आदि-
की खाने भी सबकी नहीं होतीं, अबतक भी सबकी नहीं मानी जातीं ।
प्राकृतिक वस्तु सबकी होती है, यह पक्ष मान्य होनेपर पुत्री-पत्नी आदिमें सबका
हिस्सा मानना उपस्थित हो जाता है । अतएव प्रसिद्ध पितृ-पितामहादिकी सम्पत्ति-
में ही प्राणियोका अधिकार होता है। उसमे भी अधिकारके साथ कर्तव्य लगे हैं,
‘पिण्डं दत्त्वा धनं हरेत्’ पिण्ड दानादिक श्राद्ध करनेका जो अधिकारी है, वही
पितृ-पितामहादिके दायका अधिकारी होता है । उनमें भी राजा आदिके प्रथम
पुत्र ही मुख्य अधिकारी होते हैं । अन्य पुत्रोंको पोषण-गुजारा मिलता
है । पिता पुत्रको ‘त्वं यज्ञस्त्व लोकस्त्व ब्रह्म’ इत्यादि वाक्योंद्वारा
अपने अकृत या अर्धकृत वेदाध्ययन, धर्मानुष्ठान, लोक साधनादि-
के सम्पादनका उत्तरदायित्व देता है और पुत्र ‘अह यज्ञः, अह लोकः,
अहं ब्रह्म’ इत्यादि शब्दोंद्वारा उस उत्तरदायित्वको अङ्गीकार करता
है । तभी वह सम्पत्तिका भी उत्तराधिकारी होता है । जो सम्पत्ति
तो ले लेता है, परंतु कर्तव्यपालन नहीं करता; स्वाध्यायाध्ययन, धर्मानुष्ठान,
लोकार्जनादि कर्तव्योंसे पराङ्मुख होता है, उस असाधुसे धन छीनकर कर्तव्यपालनमें
तत्पर किंतु अर्थपीडित साधुपुरुषको प्रदान करनेका राजाको अधिकार है—
योऽसाधुभ्योऽर्थमादाय साधुभ्यः सम्प्रयच्छति ।
स कृत्वा प्लवमात्मानं सन्तारयति तावुभौ ॥ (मनु० ११ । १८)
मा० रा० १७