मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसौ वर्षोंका कोई महत्त्व नहीं रहता । इसलिये 「इस बीचके व्यक्तियो या किंचित्
व्यक्ति-समूहोंसे सम्बन्धित घटनाओका कुछ भी महत्त्व नहीं रहता । अतः कुछ
व्यक्तियों या कुछ सभाओंके प्रस्तावोंके आधारपर शाश्वतिक सिद्धान्तोंमें रद्दो-
बदल नहीं हो सकता । इतिहासके आधारपर सिद्धान्तका निर्णय नहीं हो सकता ।
आये दिन अनाचार, दुराचार, पापाचारोंकी घटनाएँ घटती ही रहती हैं, फिर भी
वे उपादेय नहीं समझी जातीं । डाका, चोरी, व्यभिचार, अग्निकाण्ड, हत्या-
काण्डकी घटनाएँ घटती ही रहती हैं, परंतु इसीसे वे सब कर्म सिद्धान्त-कोटिमें
नहीं आते । जब पूर्वोक्त युक्तिसे दाय, जय, क्रयादिद्वारा प्राप्त भूमि, सम्पत्ति
आदिपर व्यक्तिगत अधिकार मान्य है, तब कुछ लोगोंके प्रस्तावों या व्यवहारोंसे
उनका रद्दोबदल कैसे हो सकता है ?
संसारमें प्रमाद, पुरुषार्थके भेदसे फलमें भेद होना अनिवार्य ही है । अतः
दाम, आराममें विशेषता प्राप्त करनेके लिये ही प्राणी गुण, कर्ममें विशेषता
लानेका प्रयत्न करता है । यदि दाम, आराममें विशेषताकी सम्भावना न हो तो
कोई भी गुण कर्ममें विशेषता लानेका प्रयत्न ही न करेगा। कुछ विद्यार्थी,
खिलाड़ी होते हैं, कुछ खर्राटा लेते रातभर सोते हैं, कुछ सावधान होकर रात-
रात जागकर पढ़ते हैं । एक ही पिताके चार पुत्र होते हैं, पिताकी सम्पत्तिके
वे चारो हिस्सेदार होते हैं । उनमेंसे कोई परिश्रमसे अपनी सम्पत्ति बढ़ा लेता है,
कोई प्रमाद एवं विलासितामें फँसकर थोड़े ही दिनोंमें फूँक ताप लेता है ।
पुनः-पुनः समाज या समष्टिके नामपर सब सम्पत्तिका राष्ट्रीयकरण एवं वितरणकी
व्यवस्था उस गुणकर्मकी विशेषताका अपलाप करना है ।
जैसे निम्नस्थलकी ओर जलका बहना स्वभाव है, वैसे ही बहिर्मुख
प्राणियोंकी पशुवत् प्रवृत्ति स्वाभाविक है। भोग विलास, छीना-झपटी, बिना परिश्रम
किये उत्तमोत्तम भोग-विलास एव सामग्रीका पाना उन्हे अभीष्ट होता है। ईश्वर-
बुद्धि, धर्म-बुद्धि ही इसमें रुकावट डालती है । इसीलिये ऐसे लोग ईश्वर एवं
धर्मको पहले समाप्त करना चाहते हैं । अपनेसे प्रबल धनवान्, बुद्धिमान्को
देखकर ईर्ष्या, उसे मिटा देनेकी इच्छा—यह पाशविक स्वाभाविक भावना
होती है । तमोगुण, रजोगुणकी अधिकता और सत्त्वगुणकी कमी ससारमें होती
ही है । अहिंसा, सत्य, अस्तेय आदि गुण समष्टिके लिये अत्यावश्यकरूपसे प्रायः
सर्वमान्य हैं, तथापि उनकी कमी होती है । इस दृष्टिसे सामन्त जागीरदार,
जमीन्दार, बादशाहों, राजाओंकी समाप्ति चाहते, व्यापारी अपनी सुविधाकी दृष्टिसे
सामन्तादिकोंकी समाप्ति चाहते तथा किसान-मजदूर उनका भी खात्मा चाहते हैं । यदि
उनसे भी अधिक अपकृष्ट कोई वर्ग हो, तो वह किसानोंका भी विनाश चाहेगा ।
इन्हीं स्वाभाविक, पाशविक प्रवृत्तियोंको रोकनेके लिये ही सदाचार, धर्म आदिकी