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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 252

मार्क्सीय द्वन्द्ववाद २३७
प्रतिबन्धक आदि हटाकर कार्यको व्यक्त कर देती है। जैसे तिलसे तैल, दुग्धसे
नवनीत, तन्तुसे पट आदि। बालूमे तेल, आकाशसे तन्तु या पटका साक्षात् विकास
कभी भी सम्भव नहीं। इसीलिये परावर द्रष्टाओके यहाँ केवल विकास ही नहीं।
किसी भी कार्यमें 'जायते, अस्ति, वर्धते, विपरिणमते, अपक्षीयते, विनश्यति-अर्थात्
उत्पत्ति, अस्तित्व, वर्द्धन, विक्रिया, अपक्षय तथा विनाश-ये छः विकार देखे जाते हैं। स्पष्ट
ही है कि कोई मनुष्य, पशु या वनस्पति उत्पन्न होता है, अस्तित्वको प्राप्त होकर
वृद्धि, अपक्षय तथा विनाशको प्राप्त होता है। वर्षामें उत्पन्न होनेवाले तृण ग्रीष्मतक
विनष्ट हो जाते हैं। बहुत-से जीव प्रतिवर्ष तत्तदृतुओंमें व्यक्त होते हैं। वसन्तके
पतझड़, आमोंके बौर, कोकिलाकूजन, ग्रीष्मकी उष्मा, वर्षा, शरद्, हेमन्त, शिशिर-
की अपनी-अपनी विशेषताएँ प्रतिवर्ष व्यक्त होती ही हैं। वेद और गीता इसी
तरह सृष्टिका पुनः प्रादुर्भाव मानते हैं।—‘सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथा पूर्वमक-
ल्पयत्।' पूर्वसृष्टिके समान ही विधाता उत्तरोत्तर सृष्टिमें सूर्य-चन्द्र आदिका विधान
करते हैं। 'भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते' (गीता ८ । १९) यह भूतग्राम
पुनः-पुनः उत्पन्न होकर प्रलीन होता है।
इसी तरह निर्माण और निर्वाणकी बात भी कोई नयी नहीं। एक ओर मनुष्य
उत्पन्न और विकसित होता है, परंतु एक ओर यदि निर्माण निर्वाण-परम्परामें अनुस्यूत
एक आत्मा मानकर जन्म, कर्मका सुसम्बद्ध कार्य-कारण भाव माना जाय, तो वह
अनियन्त्रित, अप्रामाणिक, असम्बद्ध, निर्माण-निर्वाणकी अपेक्षा कहीं श्रेष्ठ है। जन्म-
कर्मकी परम्परामें अनुस्यूत एक नित्य वस्तु बिना माने 'अकृताभ्यागमकृतविप्रणाश'
दोष अनिवार्यरूपसे उपस्थित होता है। जब लोकमें कारण-वैलक्षण्य बिना कार्य-
वैलक्षण्य नहीं हो सकता, तब हेतुकी विलक्षणता बिना जन्मों एव तत्सम्बन्धी सुख-
दुःखकी विलक्षणता कैसे हो सकेगी ? इसी तरह जब लौकिक कर्मोंका कुछ परिमाण
होता है, तब अदृष्टफलवाले कर्म बिना फल दिये कैसे नष्ट हो सकेंगे ? अतः कोई
नित्य आत्मा है, जो कि पूर्व पूर्वके शुभाशुभ कर्मोंके अनुसार उत्तरोत्तर जन्म ग्रहण
करता है। 'अभ्युदयोन्मुख लघु वस्तु भी महत्त्वपूर्ण होती है, पतनोन्मुख महान्
वस्तु भी नगण्य होती है', यह भी कोई नयी बात नहीं। प्रतिपदका चन्द्र और पूर्ण
चन्द्र इसके उदाहरण हैं, पर इतनेमात्रसे किसी सिद्धान्तका पतन, किसी व्यक्ति
या समूहका उत्थान या पतन ऐकान्तिकरूपमे नहीं कहा जा सकता । काल भेदसे
एक ही वस्तुके उत्थान और पतनकी स्थिति आती है। सूर्यका ही उदय-अस्त
तथा पुनः उदय होता है। चन्द्रमाका ह्रास होता है और पुनः उसीका विकास भी।
किसी व्यक्तिका भी जीवनमें कई बार उत्थान और कई बार पतन होता है। जो
घटनाएँ व्यष्टिमें होती हैं, वही समष्टिमें होती रहती हैं। काल-भेद हो सकता है।
'अतिभूतवादकी तरह द्वन्द्ववादका यह सिद्धान्त नहीं है कि विकसित होनेका