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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 20

सिद्धान्त भी ठीक ही है-इसमें भी कही कोई युक्तिविरुद्ध बात नहीं दिखलायी देती।
प्रामाणिक अनुशासन (शास्त्र या आप्तवाक्य) को भी न माननेपर 'तर्कानवस्थान'
दोष अनिवार्य्य होगा। अर्थात् तर्कके वस्तुयाथार्थ्यपर अवलम्बित न रहकर
व्यक्तिगत बुद्धिपर अवलम्बित रहनेके कारण जब जिस पक्षका व्यक्ति अधिक
बुद्धिमान् होगा, तब उसीका मत सिद्धान्तरूपमें मान लेना पड़ेगा और कब किस
पक्षका व्यक्ति अधिक बुद्धिमान् होगा, इसकी कोई व्यवस्था नहीं, अतः कभी
सत्यपक्ष सत्य रह सकता है और कभी असत्यपक्ष भी जीत सकता है और ऐसी
स्थितिमें ज्ञान भी अस्थिर ही रहेगा-
'यत्नेनानुमितोऽप्यर्थः कुशलैरनुमातृभिः।
अभियुक्ततरैः यै र्न्यथैवोपपाद्यते ॥'
अर्थात् कुशल अनुमाता लोग बड़े प्रयत्नसे जिस अर्थको तर्कसिद्ध
करते हैं, उसी अर्थको अन्य अनुमाता तार्किक अपने अनुमान-तर्कोंद्वारा
अन्यथा ही सिद्ध कर देते हैं। इस तरह पूर्व अनुमित अर्थका खण्डन कर नवीन
अर्थ प्रस्तुत और पुनः उसका खण्डन कर नवीन बात सिद्ध की जा सकती है। इसलिये
तर्कमें अप्रतिष्ठितताका आरोप होता है। तथापि यह तर्कका अप्रतिष्ठितत्व दूषण नहीं
भूषण ही है, क्योकि तर्कोंके अप्रतिष्ठितत्वकी सिद्धि भी तर्कसे ही होगी। जैसे 'अय
तर्कः अप्रतिष्ठितः तर्कत्वात् तर्कान्तरवत्' यह भी एक तर्क ही है और यदि यह तर्क
भी अप्रतिष्ठित है, तो इस अप्रतिष्ठित तर्कके द्वारा तर्कोंका अप्रतिष्ठितत्व भी किस
प्रकार सिद्ध होगा ? और यदि यह तर्क प्रतिष्ठित है, तो सब तर्क अप्रतिष्ठित हैं,
ऐसा नहीं कहा जा सकता; क्योकि यह भी तर्क है, जिसको प्रतिष्ठित मान लिया
गया। अतः कदाचित् तर्कोंका अप्रतिष्ठितत्व भूषण है, दूषण नहीं। अतः बड़ी
सावधानीसे किसी तत्त्वके निर्णयके लिये कुछ तर्कोंका प्रयोग किया जाना चाहिये।
सुकरातका मत था कि 'सदाचारके अनुवर्तनसे ही सम्यग्ज्ञान उत्पन्न होता
है और वह ज्ञान प्रत्येक मनुष्यको उत्पन्न होनेवाले सामान्य ज्ञानसे भिन्न ही होता
है। दृष्ट घटनाओद्वारा कार्यकारण-सम्बन्धसे सम्यग् ज्ञानकी उत्पत्ति सम्भव है।
सम्यग् ज्ञान उत्कृष्ट गुण है। व्यापक विचारोसे उसकी उत्पत्ति होती है।' कुछ
लोगोंको यह जो मत है कि 'सारा-का-सारा ज्ञान संशयाक्रान्त ही होता है, कोई
भी ज्ञान निश्चयात्मक नहीं होता' उसका निराकरण करते हुए उनका कहना है
कि 'देवता नहीं चाहते कि इस विषयको लोग जाने। इसीलिये संशयाक्रान्ति
होती है और सदाचार तथा देवानुग्रहसे सम्यग्ज्ञानकी उत्पत्ति भी सम्भव ही है,
असम्भव नहीं।' भौतिकवादियोंके मतमे सुकरातका दर्शन नीतिविषयक ही
है। वैज्ञानिक अन्वेषणकी अपेक्षा उन्होने आध्यात्मिक कल्पनाका ही अधिक आदर
किया है। उनके मतमें केवल बाह्य इन्द्रियोसे ही अनुभूति होती हो सो बात
नहीं है, अपितु तत्त्वानुभूति तो अन्तरात्मासे ही उत्पन्न (प्रत्यगुद्भूत ही) होती
है। न्याय, सदाचार और सुबुद्धि मनुष्योके आन्तरिक गुण हैं।' उनके मतमें