मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 19, कुल 866 में से
संदर्भ में पढ़ेंरहता है अर्थात् रहते हुए भी नही रहता । वह उस स्थानविशेषसे होकर जाता
है, अतः 'सत्' है, परंतु क्षणभर भी नही ठहरता, अतः 'असत्' भी है ।
हेराक्लिटसने वस्तुओका अनादित्व, अनेकत्व और क्षण-विपरिवर्तित्व माना है ।
प्राकृत घटनाचक्र जितने भी हैं, वे सब सर्वज्ञकी बुद्धिद्वारा प्रवर्त्तित हैं और
विश्वका मूल भी । अनाक्सागोरस ( ई० पू० ५००-४८८ ) और एम्पीडोल्कीज
( ई० पू० ४६०-३७० ) का कथन है कि 'वस्तुओकी अनेकविधताका पर्यवसान
परमाणुओंकी अनन्ततामें हो जाता है । सभी वस्तुओके बीजभूत परमाणुओंके संयुक्त
होनेपर ही विश्व उत्पन्न होता है । असत्से कुछ उत्पन्न नही हो सकता, न सत्का
विनाश ही हो सकता है। अणुओंका संयोग-वियोगात्मक ही परिवर्तन है । कोई भी
वस्तु 'आकस्मिक' नहीं । सब वस्तुएँ कार्य्य-कारणसम्बद्ध ही है । अणु और शून्य
इन दोके अतिरिक्त और कुछ नहीं है । अणु अनन्त हैं और उनकी अवस्थाएँ
भी अनन्त हैं । नये अणु निःसीम प्रदेशोंमे अनवरत गिरते रहते हैं एवं पारस्परिक
संघर्षोंसे ही भिन्न होते रहते हैं । उनके इन पारस्परिक सङ्घर्षोसे ही 'पार्श्वभ्रमि
गतियाँ' ( चारो ओर भँवर जैसी गतियाँ ) उत्पन्न होती हैं, जिनसे असंख्य
विश्वोंकी उत्पत्ति और विनाशकी परम्परा ( शृङ्खला ) चलती रहती है ।' इनके
मतमें 'अणुओंमें आन्तरिक ( भीतरी ) गति नही होती । क्रान्ति और संघर्षोंसे
ही परस्पर क्रिया-प्रतिक्रिया होती है । सूक्ष्म अणुओंसे सारा शरीर व्याप्त है और
उन्हींसे 'जीवन' और 'आत्मा' कही जानेवाली वस्तुओकी उत्पत्ति होती है ।'
डीमोक्रीटस ( ई० पू० ४६०-३५७ )के मतमें 'इन्द्रियोसे ही ज्ञान उत्पन्न होता
है । जो एक जगह सत्य है, वह दूसरी जगह असत्य भी हो सकता है ।' इनके
मतमें मानवानुभूतिका ही सर्वाधिक महत्त्व है, ऐसा सोफिस्टोका कहना है ।
भौतिकवादियोके मतमें 'धार्मिक विचारोंमे दर्शनोंमें बडा प्रतिरोध उत्पन्न हुआ ।
चूंकि यहाँ मानव-बुद्धि सीमित ही है, अतः उससे तत्त्वज्ञान दुर्लभ ही है । प्रत्येक
मानवके लिये दुर्भेद्य अन्धकार स्वभावसिद्ध है, इसीलिये प्रकृति भी रहस्यभूता ही
रह जाती है ।'
वस्तुस्तु भौतिकवादी धार्मिक पक्षको बडे विकृत रूपमें व्यक्त
करते हैं । जो दग्धा ( जलनेवाला ) है, वह दहन ( जलाये जाने ) का
विषय नहीं हो सकता, उसी प्रकार जो ज्ञाता ( जाननेवाला ) है, वह ज्ञान
( जानने ) का विषय नही हो सकता—यह सिद्धान्त सर्वथा युक्तिसङ्गत ही है। ठीक
वैसे ही, रूप जैसे श्रोत्रेन्द्रियके द्वारा नहीं जाना जा सकता ( केवल चक्षुरिन्द्रियके
द्वारा ही जाना जा सकता है ), वैसे ही शब्दस्पर्शादिगुणपञ्चकसे परेके पदार्थ
अनिन्द्रियगोचर हैं—इन्द्रियोंद्वारा नहीं जाने जा सकते ( अर्थात् प्रत्यक्षके क्षेत्रके
बाहर हैं, केवल अनुमान या शब्द-प्रमाणके द्वारा ही जाने जा सकते हैं ) । यह