मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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(चुहिया), कुत्ती, गिलहरी, बिल्ली एवं भल्लुकी होकर मनुष्य बना है।' परंतु अमेरिकाके
मनुष्य लम्बे ओष्ठवाले होनेसे भी हाथीका विकास सिद्ध नहीं होता।
अफ्रीकाके 'बुशमैन' अँधेरेमें देखते हैं, शिकार पकड़ते हैं, फिर भी वे गृध्र,
उल्लू, सर्पसे उत्पन्न सिद्ध नहीं होते। यों तो कुछ-न-कुछ लक्षण मनुष्यमें सभी
प्राणियोंके पाये जा सकते हैं, इससे क्या यह भी कहा जाय कि 'मनुष्य सभी
जातियोंमें होकर आया है?' ऐसा माननेपर हेकल, हक्सले आदिकी इक्कीस
श्रेणीवाली बात भी असत्य ठहरेगी। हिंदू-शास्त्र तो यह मानते हैं कि 'प्राणी
चौरासी लाख योनियोंमें भटकनेके बाद ही मनुष्य बना है। इसीलिये वह पैदा
होते ही दूध पीनेमें प्रवृत्त होता है। हर्ष, शोक, भयका संचार भी पिछली अनेक
योनियोंमें उसके जन्म होनेकी सूचना है। उत्पन्न होते ही बालकमे पूर्वजन्मके
संस्कार उपलब्ध होते हैं, तब गर्भमें भी अनेक संस्कारोंका होना उचित ही है।
उन संस्कारोंके अनुसार शरीरकी बनावटमें भी कुछ अन्तर पड़ता है। सगर्भा
माताके भावविशेषसे प्रभावित होनेपर भी गर्भपर उसका असर पड़ता है। इस
तरह गर्भस्थके संस्कार, माताके विचार, व्यवहार, देश, काल, परिस्थितिकी
विशेषतासे गर्भस्थ बालकमें भी विचित्रता आ जाती है।
विकासवादके विरुद्ध सृष्टिमें कितनी ही बाते हैं, जिनसे विकासका सिद्धान्त
खण्डित होता है। नरोंके स्तन, बकरीके गलेके स्तन, घोड़ेमे स्तनोंका अभाव, भेड़े-
की सींग, मनुष्यकी छठी अँगुली आदि विकासवादके विशिष्टाविशिष्ट अङ्गोंकी
कल्पनाको मिथ्या सिद्ध करते हैं। भैंसा, बैल, बकरा, हाथी, ऊँट, सिंह, कुत्ता,
वानर और पुरुषोंके स्तन कब, क्यो और कैसे होते हैं, इनका उत्तर विकासवादमें
नहीं है। अमीबामें नर-मादाका भेद नहीं था, आगे चलकर वह कैसे हो गया ?
पहलेके प्राणियोंमें स्तन नहीं थे, चमगादड़से स्तन भी उत्पन्न होने लगे। जब
पहले बिना स्तनके भी प्राणियोका पोषण होता ही था, तब फिर स्तनकी क्या
आवश्यकता आ पड़ी ? फिर नरोके स्तनोंका क्या प्रयोजन और घोड़ेमें स्तन
क्यों नहीं ? मेढोंमें सींग परम्परासे नहीं होते। किसीको हो जाते हैं,
किसीको नहीं। विकासवादी इनका क्या कारण कहेंगे ? वस्तुतस्तु गर्भस्थके संस्कारों,
माता-पिताके विचारो एव व्यवहारोसे ही ये सब विकृत अङ्ग होते हैं। जिस तरह
मनुष्योंमें आठ-दस स्तन और पूँछ आदिके चिह्न देखे जाते हैं, उसी तरह पशुओंमें
किमी अन्य पशुके चिह्न नहीं दिखायी पड़ते। वानरोंमें न कभी आठ-दस स्तन
होते हैं और न एक साथ एकसे अधिक बच्चे ही होते हैं। परंतु मनुष्यके अनेक
स्तन एवं एक साथ अनेक बच्चे भी पैदा होते हैं, अतः न वानर ही अन्य
पशुओंका विकास है और न मनुष्य वानरका ही विकास है।
पशुओको पुराने जन्मकी स्मृति नहीं होती, मनुष्योंको पिछली स्मृतियाँ