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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 155

१४२ मार्क्सवाद और रामराज्य
एक-सा ही रहता है । न वह घटता है न बढ़ता है। यह बात प्रत्यक्ष प्रयोगसे सिद्ध
है। 'नासतो विद्यते भावः' (गीता २।१६) का ठीक यही अर्थ है। प्रथम अर्वाचीन
रसायनशास्त्रज्ञ प्रपञ्च सृष्टिके ९२ मूलतत्त्व मानते थे । परंतु अब उन्होंने यह
माना कि 'यह मूलतत्त्व स्वयंसिद्ध नहीं । इनकी जड़में कोई एक ही तत्त्व
है, उसीसे सूर्य, चन्द्र, तारागण, पृथ्वी आदि सृष्टि उत्पन्न हुई है। उस एक
पदार्थको सांख्यानुसार 'प्रकृति' कहा जाता है। 'इन्द्रियोंके अगोचर, अव्यक्त,
सूक्ष्म, अखण्डित एक ही निरवयव मूल द्रव्यसे व्यक्तकी सृष्टि होती है,
इस सांख्यमतको ही पाश्चात्त्य भौतिकवादी भी मान गये हैं । हाँ, वे यह
भी कहते हैं कि 'इस मूल द्रव्यकी शक्तिका क्रमशः विकास हो रहा है । पूर्वापर-
क्रम छोड़कर अचानक निरर्थक कुछ भी निर्माण नहीं होता ।' इसी मतको
'उत्क्रान्तिवाद' या 'विकासवाद' कहा जाता है। तदनुसार सूर्यमालामे पहले कुछ
एक ही सूक्ष्म द्रव्य था, उसकी गति अथवा उष्णताका परिणाम घटता गया ।
तब उक्त द्रव्यका अधिकाधिक सङ्कोच होने लगा और पृथ्वीसमेत सब ग्रह
क्रमशः उत्पन्न हुए। अन्तमें जो शेष अंश बचा, वही सूर्य है। पृथ्वीका भी सूर्यके
सदृश पहले एक उष्ण गोला था। ज्यों-ज्यों उष्णता कम होती गयी, त्यों-त्यों
मूल द्रव्योंमेंसे ही कुछ द्रव्य पतले और कुछ घने हो गये । इस प्रकार पृथ्वीके
ऊपरका भाग हवा और पानी तथा उसके नीचेका पृथ्वीका जड़ गोला—ये तीन
पदार्थ बन गये । इन तीनोके मिश्रण अथवा संयोगसे सब सजीव एवं निर्जीव
सृष्टि उत्पन्न हुई । डार्विन आदिकोके अनुसार 'छोटे कीडोसे-ही विकास होते-
होते मनुष्य बन गया।' यह पीछे कहा जा चुका है कि 'इन लोगोने चेतनाको
भी जड़का ही परिणाम माना है।' परंतु कान्ट आदिका कथन है कि 'सृष्टिका
ज्ञान आत्माके एकीकरण व्यापारका फल है । इसलिये आत्माको स्वतन्त्र पदार्थ
मानना ही चाहिये।' बाह्य सृष्टिके ज्ञाता आत्माको स्वयं भी बाह्य सृष्टिका एक
भाग मानना वैसा ही अनङ्गत है, जैसा कि किसीका अपने कंधेपर स्वयं ही बैठ
सकना । सांख्योके सत्त्व, रज, तमके स्थानमे भौतिकवादी गति, उष्णता और
आकर्षणशक्ति मानते हैं। पदार्थ एक होनेपर भी उसमें गुणभेदके बिना विचित्र
सृष्टि उपपन्न नहीं हो सकती, अतः उस प्रकृतिमे सत्त्व, रज, तम गुण माने
जाते हैं।
हेकलका कहना है कि 'मन, बुद्धि, आत्मा आदि शरीरके ही धर्म हैं ।
अतएव जब मनुष्यका मस्तिष्क बिगड़ जाता है, तब उसकी स्मरण-शक्ति नष्ट हो
जाती है और वह पागल हो जाता है। सिरपर चोट लगनेसे जब मस्तिष्कका कोई
भाग बिगड जाता है, तब भी मानसिक शक्ति नष्ट हो जाती है । मस्तिष्कके
साथ ही मनोधर्म और आत्मा भी समाप्त है। इस दृष्टिमे फिर केवल जड़