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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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११८ मार्क्सवाद और रामराज्य
यद्यपि—
यस्यार्थास्तस्य मित्राणि यस्यार्थास्तस्य बान्धवाः ।
यस्यार्थाः स पुमाँल्लोके यस्यार्थाः स च पण्डितः ॥
( महा० शां० प० ८ । १८ )
यस्यास्ति वित्तं स नरः कुलीनः
स पण्डितः स श्रुतवान् गुणज्ञः ।
स एव वक्ता स च दर्शनीयः
सर्वे गुणाः काञ्चनमाश्रयन्ति ॥
( नीतिशतक ४१ )
अर्थेभ्योऽथ प्रवृद्धेभ्यः संवृत्तेभ्यस्तस्ततः ।
क्रियाः सर्वाः प्रवर्तन्ते पर्वतेभ्य इवापगाः ॥
( वाल्मीकिरामायण ६ । ८३ । ३२ )
इत्यादि शब्दोद्वारा शास्त्रोंमें धनका बड़ा महत्त्व बतलाया गया है
और यह ठीक भी है, परंतु 'अर्थसे अधिक कुछ है ही नहीं । धार्मिक, आध्यात्मिक
नैतिक उन्नतियों तथा तदनुकूल सभी नियम, सबकी आधारभित्ति अर्थ ही है,
वही सर्वश्रेष्ठ है, यह समझना तथा अर्थके लिये सनातन सत्य, शाश्वत न्याय, नित्य आत्मा
परमात्मा तथा धार्मिक नियमोंका भी परित्याग कर देना तो गरीबी एवं दरिद्रताकी
ही शुद्ध प्रक्रिया है । गरीबीमे धनवान्से ईर्ष्या-द्वेष भी होता है । उन्हे मिटा
देनेकी इच्छा भी होती है, फिर तदनुकूल कुछ युक्तियाँ तथा तर्क भी ढूँढ लिये
जाते हैं । इस तरह अधिकांश पाश्चात्त्य दर्शन विशेषतः मार्क्सदर्शन प्रक्रियावादी
दर्शन है । कोई भी समझदार समझ सकता है कि जड़, भौतिक अर्थ स्वयं
महत्त्वपूर्ण नहीं है किंतु भोक्ताके भोगका साधन होनेसे ही उसका महत्त्व है ।
भोक्ताके बिना उसका कुछ भी मूल्य नही है । कोई भी वस्तु भोक्ताद्वारा माँग
होनेपर ही मूल्यवान् होती है । भोक्ताकी माँग न होनेपर उसका कुछ भी मूल्य
नहीं होता । चेतन पुरुष ही अर्थका उत्पादक, वर्धक एवं रक्षक भी है । फिर भोक्ता
या चेतन मनुष्यका महत्त्व कम आँकना, उसे आर्थिक व्यवस्थाओका दास बनाना
कहाँतक संगत है ? अवश्य ही सामान्य स्थिति यह है कि बड़े-से-बड़े लोग भी अर्थके
दास होते हैं—'अर्थस्य पुरुषो दासः' । सामान्य मनुष्य मनका दास, परिस्थितियोका
गुलाम, इन्द्रियोका किंकर एव विषयोका कीड़ा होता है । परंतु विशिष्ट
जितेन्द्रिय सयमी प्राणी निश्चय ही मन, इन्द्रिय, भोग, परिस्थिति सबको अपना दास
बनाकर उनका स्वामी हो जाता है । अनेक राजाओ, धनवानोने परोपकारके
लिये, पुण्यके लिये, अध्यात्मनिष्ठाके लिये धन ही नहीं, शरीर एवं प्राणतक दे दिये
हैं । रामचन्द्र, हरिश्चन्द्र, रन्तिदेव, शिवि, दिलीप आदि इसीके उदाहरण हैं ।
रन्तिदेवने कहा था—