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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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१६४ मार्क्सवाद और रामराज्य
नैतिकता और अनुबन्धोको स्थान नहीं देता । उसने भी राज्यको साध्य बनाया
है, साधन नही । 'राज्य सर्वेसर्वा है ।'
अनुबन्धवादमे राज्य कृत्रिम संस्था मानी गयी, व्यक्तिको सर्वोच्च स्थान मिला,
सामाजिक हित गौण हो गया । ह्यूम, बेन्थस आदिने उपयोगिताको राज्यके
जन्मका कारण कहा । इन्होने राज्यके अनुबन्धवादी और कृत्रिम रूपका खण्डन
किया । परंतु उपयोगिताके आधारपर व्यक्तिको सर्वेसर्वा माना । आदर्शवादने
राज्यको प्राकृतिक संस्था और व्यक्तिको स्वभावतः सामाजिक प्राणी कहा । इसीलिये
प्राणी संस्था या समाज बनाता है । इसी प्रवृत्तिसे राज्य बना । व्यक्तिका राज्यमें
रहना आन्तरिक मनोवृत्तिके अनुकूल है । राज्य व्यक्तिकी सामाजिक मनोवृत्तिका
प्रतिबिम्ब है । इसमें राज्य साध्य है, व्यक्ति साधन । परंतु भारतीय भावनाके
अनुसार 'रञ्जनाद्राजा' के सिद्धान्तानुसार प्रजाका रञ्जन करना ही राजाका कार्य
है । प्रजाहितार्थ तथा व्यक्तियोके हितार्थ राजा अपने सर्वस्वका बलिदान
करता है—
स्नेहं दया च सौख्यं च यदि वा जानकीमपि ।
आराधनाय लोकस्य मुञ्चतो नास्ति मे व्यथा ॥
(उत्तररामचरि० १ । १२)
व्याधि नास हित जननी गनै न सो सिसु पीर ।
—के अनुसार यह ठीक है कि कई प्रजाहित ऐसे हो सकते हैं कि जिन्हें
सामान्य जन नहीं समझ सकते । परंतु समष्टिमे विशिष्टो एव विशेषज्ञोका अभाव
नही रहता । अतः समष्टिकी उपेक्षा कर नियमनिर्माण या समाजकी इच्छाके
प्रतिकूल कार्य करनेके लिये बाध्य करना न्यायसङ्गत नही । कहा जा चुका है
कि डाक्टरसे आपरेशन कराया जा सकता है, परंतु विरोधी शत्रुको ऐसा करनेकी
स्वतन्त्रता नहीं दी जा सकती । सावयववादके अनुसार नागरिक अङ्गहित और
राज्य सावयवहित अन्योन्याश्रित है । सावयवराज्यके बिना अवयव नागरिककी
बौद्धिक, शारीरिक, नैतिक, आर्थिक प्रगति नहीं हो सकती । समाज या राज्यके
बाहर सभ्य-जीवन सम्भव नही होता । इस दृष्टिसे राज्य एक आवश्यक विकार न
होकर अनिवार्य प्राकृतिक संस्था है । हाब्सके सत्ताधारी 'दीर्घकाय मानवदेव'
(लेवियाथन) के समान ही आदर्शवादियोने भी नागरिकोंके हितार्थ एक 'दीर्घकाय' को
समाजशास्त्रमें प्रस्तुत किया। यह 'दीर्घकाय' आदर्शवादियोका राज्य है। हीगेलका राज्य
विश्वात्मा या 'सर्वव्यापक विचार-तत्त्व'का प्रतिबिम्ब है। बोसाकेका राज्य 'सामान्येच्छा'-
का प्रतीक है। इन सिद्धान्तोकी ओटमे व्यक्तिगत उचित स्वतन्त्रताका भी अपहरण
किया गया । नैतिकताकी वृद्धि राज्य तथा नागरिकका सर्वश्रेष्ठ लक्ष्य माना जाना
ही आदर्शवादका भौतिकवादियोसे वैशिष्ट्य है । राजनीति शास्त्रके साथ आचार-