सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 124, कुल 866 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 124

उदारवाद और आदर्शवादका समन्वय मिलता है । वह क्रामवेलका, जिसने
इंगलैंडमें कुछ कालके लिये गणतन्त्र स्थापित किया था, वंशज था । वह
'प्यूरिटन' और 'नानकन्फार्मिस्ट' ( आत्मसंयमी और स्वतन्त्र ) मनोवृत्ति-
का था । इसीलिये वह 'स्वतन्त्रता' और 'नैतिकता' का प्रेमी था । उसके समयमे
मिलकी 'स्वतन्त्रता' और 'अर्थशास्त्र' का पर्याप्त प्रभाव था । अतः वह व्यक्तिगत
स्वतन्त्रताका पोषक था । ग्रीन राज्यको 'संघोंका संघ' मानता था । इन संघोंका
जन्म राज्यके पूर्व हुआ था, राज्य इनका जन्मदाता नहीं । इनका समन्वय
करना राज्यका कर्तव्य है । ग्रीन वास्तविक अधिकार राज्यकी देन मानता था ।
सामाजिक प्रगति तथा नैतिकताकी वृद्धिमें सहायक अधिकार ही वास्तविक अधिकार
होते हैं । वह बाहुबलद्वारा राज्यका संचालन और मानवके अधिकारोंकी रक्षा
मानता है । परंतु वह बाहुबलको राज्यके व्यक्तिगत अधिकारोंका जन्मदाता नहीं
मानता । वह व्यक्तिगत अधिकारोंका स्रोत राज्य और राज्यका आधार जनस्वीकृति
मानता है । ग्रीन स्वतन्त्रताका प्रेमी था, परंतु व्यक्तिवादियोंके समान वह
स्वेच्छानुसार कार्य करनेको स्वतन्त्रता नहीं मानता था । वह सामाजिक, नैतिक
दृष्टिकोणसे प्राप्तियोग्य वस्तु या सुखके लिये कार्य करनेको ही स्वतन्त्रता
समझता था । नैतिकताकी वृद्धि सामाजिक भलाईके कार्यकी स्वतन्त्रता ही
स्वतन्त्रता है । ग्रीन अनुबन्धवादको इतिहास एवं तर्कके दृष्टिकोणसे मिथ्या
कहता है ।
'जनस्वीकृति राज्यका आधार है, बाहुबल नहीं' ग्रीनका यह ऐतिहासिक
वाक्य है । फिर भी यह लॉकके समान अनुबन्धवादी नहीं था । जनस्वीकृतिपर
आधारित राज्य सामान्येच्छासे होना चाहिये । सामान्य भलाईकी सामान्य चेतना
उसकी सामान्येच्छाका अर्थ है । जो राज्य ऐसा नहीं, उसका अन्त निश्चित है ।
ग्रीनकी सामान्येच्छा रूसोके समान जनतन्त्रीय नहीं, किंतु उसके मतानुसार
राज्यतन्त्र भी सामान्येच्छाका प्रतिनिधित्व कर सकता है । व्यक्तिगत सम्पत्तिके
सम्बन्धमें वह पूँजीपतिका अस्तित्व उचित मानता था; किंतु जमीनदारका नहीं ।
वह उत्पादनमें जमीनदारोंका हाथ नहीं मानता, अतः वह जमीनदारी प्रथाका
विरोधी था । ग्रीनके अनुसार राज्य आदर्श संस्था अवश्य है, परंतु व्यक्तिराज्यका
दास नहीं । समाज हितके लिये नागरिक राज्यका विरोध कर सकता है, परंतु
बहुमत उसके पक्षमें होना चाहिये । इस तरह राज्यका विरोध किया जा सकता
है । परंतु शर्तें कठिन हैं । वह युद्धविरोधी और विश्वसंघद्वारा संसारमें शान्ति
स्थापनाका समर्थक था । उसके अनुसार समाजहितका राज्यहितसे अधिक महत्त्व
है । राज्य समाजका प्रतिनिधि है, स्वामी नहीं । अतः राज्यको विश्वसमाजकी
सामान्य नैतिक चेतनाके अनुसार संचालित होना चाहिये ! यह सामान्य चेतना