मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रवेश करेगी । उसमें आदर्शराज्य सर्वव्यापक होगा । विवेक ही सत्ताधारीका
स्थान ग्रहण करेगा । पूर्ण स्वतन्त्रता एवं समानता सर्वव्यापक होगी ।'
कहा जाता है कि फिक्टेके इस विश्लेषणका प्रभाव हीगेल एवं मार्क्सपर
पड़ा था । उसके मतानुसार भी 'उपयुक्त कार्य करनेमें मनुष्यकी स्वतन्त्रता ही
स्वतन्त्रता है । इससे भिन्न स्वतन्त्रता आत्महत्याकी स्वतन्त्रता-जैसी है ।
स्वतन्त्रता आन्तरिक-बाह्य दो प्रकारकी होती है । आन्तरिक स्वतन्त्रताद्वारा व्यक्ति
निजी प्रेरणाओंसे मुक्त होता है, अर्थात् स्वच्छ विवेकके अनुसार कार्य करता है।
बाह्य स्वतन्त्रताका अर्थ है व्यक्तिके कार्योंमें किसी अन्य व्यक्तिका हस्तक्षेप न
होना । फिक्टेके मतानुसार आन्तरिक स्वतन्त्रता ही सच्ची स्वतन्त्रता है, इससे
मनुष्य तुच्छ प्रेरणाओंको पराजित कर विवेकके अनुसार जीवन-यापन करता है ।
व्यक्तिवादियोंके अनुसार ऐसी स्वतन्त्रता व्यक्तिस्वतन्त्रताद्वारा ही सम्भव हो
सकती है ।' वह कहता है—'राज्यका कर्त्तव्य है कि शिक्षा आदि साधनोद्वारा
नागरिकको आन्तरिक या नैतिक स्वतन्त्रता-प्राप्तिके योग्य बनाये ।' फिक्टेने
राष्ट्रीय राज्य-सञ्चालनके लिये भाषाकी एकता, आर्थिक राष्ट्रियता एवं समाजपर
सम्पूर्ण नियन्त्रण आवश्यक बतलाया । कहा जाता है कि फिक्टेकी इसी विचार-
धारासे हिटलर एवं मुसोलिनीका जन्म हुआ । फिक्टेके मतसे राज्यद्वारा आर्थिक
और सामाजिक व्यवस्थाका संचालन होना चाहिये। उसने समाजको किसान, शिल्पी
एवं व्यापारी—इन तीन विभागोंमें बाँटा है। उसके आदर्श-राज्यमें वस्तुओंका मूल्य
राज्यद्वारा निर्धारित होगा । वह बेरोजगारीका पूर्ण विरोधी था, पर साथ ही
व्यक्तिगत सम्पत्तिका समर्थक । वह व्यक्तिको स्वतन्त्र छोड़ देनेका भी विरोधी
था । फिक्टे पहले जनवादी था, परंतु धीरे-धीरे वह अधिनायकवादी और फिर
शुद्ध राजतन्त्रवादका समर्थक हो गया । वह पैतृक शासनप्रथाको सर्वश्रेष्ठ
कहता था । उसके मतमें राजतन्त्रपर न धारासभा और निर्वाचक-मण्डलका ही
नियन्त्रण होना चाहिये । यद्यपि उसके गुरु काण्टके मतमे राज्यमे व्यवस्थापिका
सभाका ही प्रमुख स्थान था । फिक्टेके अनुसार मानवप्रगति शूरवीरो एव
विद्वानोंके कार्योसे हुई है । भविष्यके आदर्श राज्यमें भी इन्हींकी प्रधानता होगी ।
तभी शुद्ध विवेकके साथ नियम-निर्माण हो सकेगा । ऐसे नियमोसे ही नागरिककी
नैतिक एव आन्तरिक स्वतन्त्रता सम्भव होगी । विश्वमें सत्यके आधिपत्यके लिये
असभ्योंपर सभ्य लोगोंका शासन होना चाहिये । इस तरह विद्वान्, शिक्षक भी हो,
शासक भी हो—यह फिक्टेका आदर्श है । कहा जाता है, हिटलरका नाजीदल
इन्हीं भावनाओंके प्रभावसे बना था ।
फिक्टेका विचारतत्त्व बाह्य वस्तुओंसे प्रभावित नही होता; अर्थात्
वेदान्तियोंके नित्यबोधस्वरूप ब्रह्मके समान निर्विकार है, अन्तःकरण-वृत्तिरूप