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सर्वकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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पृष्ठ 90

२७ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *

पुण्य लेकर चल देता है।^* अतः मनुष्यको उचित है कि वह जल और साग देकर अथवा स्वयं जो कुछ खाता है, उसीसे अपनी शक्तिके अनुसार आदरपूर्वक अतिथिका पूजन करे।

गृहस्थ पुरुष प्रतिदिन पितरोंके उद्देश्यसे अन्न और जलके द्वारा श्राद्ध करे और अनेक या एक ब्राह्मणको भोजन कराये। अन्नमेंसे अग्राशन निकालकर ब्राह्मणको दे। ब्रह्मचारी और संन्यासी जब भिक्षा माँगनेके लिये आयें, तब उन्हें भिक्षा अवश्य दे। एक ग्रास अन्नको भिक्षा, चार ग्रास अन्नको अग्राशन और अग्राशनसे चौगुने अन्नको श्रेष्ठ द्विज हन्तकार कहते हैं।^\dagger भोजनमेंसे अपने विभवके अनुसार हन्तकार, अग्राशन अथवा भिक्षा दिये बिना कदापि उसे ग्रहण न करे। अतिथियोंका पूजन करनेके बाद प्रिय-जनों, कुटुम्बियों, भाई-बन्धुओं, याचकों, आकुल व्यक्तियों, बालकों, वृद्धों तथा रोगियोंको भोजन कराये। इनके अतिरिक्त यदि कोई दूसरा अकिञ्चन मनुष्य भी भूखसे व्याकुल होकर अन्नकी याचना करता हो तो गृहस्थ पुरुष वैभव होनेपर उसे अवश्य भोजन कराये। जो सजातीय बन्धु अपने किसी धनी सजातीयके पास जाकर भी भोजनका कष्ट पाता है, वह उस कष्टकी अवस्थामें जो पाप कर बैठता है, उसे वह धनी मनुष्य भी भोगता है। सायंकालमें भी इसी नियमका पालन करे। सूर्यास्त होनेपर जो अतिथि वहाँ आ जाय, उसकी यथाशक्ति शय्या, आसन और भोजनके द्वारा पूजा करे। बेटा! जो इस प्रकार अपने कंधोंपर रखा हुआ गृहस्थाश्रमका भार ढोता है, उसके लिये स्वयं ब्रह्माजी, देवता, पितर, महर्षि, अतिथि, बन्धु-बान्धव, पशु-पक्षी तथा छोटे-छोटे कीड़े भी, जो उसके अन्नसे तृप्त हुए रहते हैं, कल्याणकी वर्षा करते हैं।


श्राद्ध-कर्मका वर्णन

मदालसा बोली— बेटा! गृहस्थके कर्म तीन प्रकारके हैं। नित्य, नैमित्तिक तथा नित्यनैमित्तिक। इनका वर्णन सुनो। पञ्चयज्ञसम्बन्धी कर्म, जिसका अभी वर्णन किया है, नित्य कहलाता है। पुत्र-जन्म आदिके उपलक्षमें किये हुए कर्मको नैमित्तिक कहते हैं। पर्वके अवसरपर जो श्राद्ध आदि किये जाते हैं, उन्हें विद्वान् पुरुषोंको नित्यनैमित्तिक कर्म समझना चाहिये। उनमेंसे नैमित्तिक कर्मका वर्णन करती हूँ। आभ्युदयिक श्राद्ध नैमित्तिक कर्म है, जिसे पुत्र-जन्मके अवसरपर जातकर्म संस्कारके साथ करना चाहिये। विवाह आदिमें भी, जिस क्रमसे वह बताया गया है, भलीभाँति उसका अनुष्ठान करना उचित है। नान्दीमुख नामके जो पितर हैं, उन्हींका इसमें पूजन करना चाहिये और उन्हें दधिमिश्रित जौके पिण्ड देने चाहिये। उस समय यजमानको एकाग्रचित्त होकर उत्तर या पूर्वकी ओर मुँह करके बैठना चाहिये। कुछ लोगोंका मत है कि इसमें बलिवैश्वदेव कर्म नहीं होता। आभ्युदयिक श्राद्धमें युग्म ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करना और प्रदक्षिणापूर्वक उनका पूजन करना उचित है। यह वृद्धिके अवसरोंपर किया जानेवाला नैमित्तिक श्राद्ध है। इससे भिन्न और्ध्वदैहिक श्राद्ध है, जो मृत्युके पश्चात् किया जाता है।


^* अतिथियस्य भग्नाशो गृहात् प्रतिनिवर्त्तते। स दत्त्वा दुष्कृतं तस्मै पुण्यमादाय गच्छति॥ (२९।३१)
^\dagger ग्रासप्रमाणा भिक्षा स्यादग्रं ग्रासचतुष्टयम्। अग्रं चतुर्गुणं प्राहुर्हन्तकारं द्विजोत्तमाः॥ (२९।३५)