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सर्वकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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पृष्ठ 254

१५४ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *

अपने कुलमें श्रेष्ठ तथा उत्तम गुणोंसे युक्त होता है तथा रौच्य मन्वन्तरकी कथा सुननेसे वह शत्रुओंकी सेनाका संहार कर डालता है। भौत्य मन्वन्तरकी कथा श्रवण करनेपर मनुष्य देवताकी कृपा प्राप्त करता है; इतना ही नहीं, उसे अग्निहोत्रके पुण्य तथा गुणवान् पुत्रोंकी प्राप्ति होती है। मन्वन्तरोंके देवता, ऋषि, इन्द्र, मनु, मनुके पुत्र तथा राजवंशोंका वर्णन सुनकर मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। देवता, ऋषि, इन्द्र, राजा तथा मन्वन्तरोंके स्वामी- ये प्रसन्न होकर कल्याणमयी बुद्धि प्रदान करते हैं। वैसी बुद्धि पाकर मनुष्य शुभ कर्म करता है, जिससे वह चौदह इन्द्रोंकी आयुपर्यन्त उत्तम गतिका उपभोग करता है।


सूर्यका तत्त्व, वेदोंका प्राकट्य, ब्रह्माजीद्वारा सूर्यदेवकी स्तुति और सृष्टि-रचनाका आरम्भ

क्रौष्टुकि बोले- द्विजश्रेष्ठ! आपने मन्वन्तरोंकी स्थितिका भलीभाँति वर्णन किया और मैंने क्रमशः विस्तारपूर्वक उसे सुना। अब राजाओंका सम्पूर्ण वंश, जिसके आदि ब्रह्माजी हैं, मैं सुनना चाहता हूँ; आप उसका यथावत् वर्णन कीजिये।

मार्कण्डेयजीने कहा- वत्स! प्रजापति ब्रह्माजीको आदि बनाकर जिसकी प्रवृत्ति हुई है तथा जो सम्पूर्ण जगत्का मूल कारण है, उस राजवंशका तथा उसमें प्रकट हुए राजाओंके चरित्रोंका वर्णन सुनो- जिस वंशमें मनु, इक्ष्वाकु, अनरण्य, भगीरथ तथा अन्य सैकड़ों राजा, जिन्होंने पृथ्वीका पालन किया था, उत्पन्न हुए थे। वे सभी धर्मज्ञ, यज्ञकर्ता, शूरवीर तथा परम तत्त्वके ज्ञाता थे। ऐसे वंशका वर्णन सुनकर मनुष्य समस्त पापोंसे छूट जाता है। पूर्वकालमें प्रजापति ब्रह्माने नाना प्रकारकी प्रजाको उत्पन्न करनेकी इच्छा लेकर दाहिने अँगूठेसे दक्षको उत्पन्न किया और बाँये अँगूठेसे उनकी पत्नीको प्रकट किया। दक्षके अदिति नामकी एक सुन्दरी कन्या उत्पन्न हुई, जिसके गर्भसे कश्यपने भगवान् सूर्यको जन्म दिया।

क्रौष्टुकिने पूछा- भगवन्! मैं भगवान् सूर्यके यथार्थ स्वरूपका वर्णन सुनना चाहता हूँ। वे किस प्रकार कश्यपजीके पुत्र हुए? कश्यप और अदितिने कैसे उनकी आराधना की? उनके यहाँ अवतीर्ण हुए भगवान् सूर्यका कैसा प्रभाव है? वे सब बातें यथार्थरूपसे बताइये।

मार्कण्डेयजी बोले- ब्रह्मन्! पहले यह सम्पूर्ण लोक प्रभा और प्रकाशसे रहित था। चारों ओर घोर अन्धकार घेरा डाले हुए था। उस समय परम कारणस्वरूप एक अविनाशी एवं बृहत् अण्ड प्रकट हुआ। उसके भीतर सबके प्रपितामह, जगत्के स्वामी, लोकस्रष्टा, कमलयोनि साक्षात् ब्रह्माजी विराजमान थे। उन्होंने उस अण्डका भेदन किया। महामुने! उन ब्रह्माजीके मुखसे 'ॐ' यह महान् शब्द प्रकट हुआ। उससे पहले भूः, फिर भुवः, तदनन्तर स्वः-ये तीन व्याहृतियाँ उत्पन्न हुईं, जो भगवान् सूर्यका स्वरूप हैं। 'ॐ' इस स्वरूपसे सूर्यदेवका अत्यन्त सूक्ष्म रूप प्रकट हुआ। उससे 'महः' यह स्थूल रूप हुआ, फिर उससे 'जन' यह स्थूलतर रूप उत्पन्न हुआ। उससे 'तप' और तपसे 'सत्य' प्रकट हुआ। इस प्रकार ये सूर्यके सात स्वरूप स्थित हैं, जो कभी प्रकाशित होते हैं और कभी अप्रकाशित रहते हैं। ब्रह्मन्! मैंने 'ओम्' यह रूप बताया है; वह