संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 218, कुल 296 में से
संदर्भ में पढ़ें२१८ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *
चौरासी सेनानायक अपनी वाहिनीसे घिरे हुए
यात्रा करें ॥ ४ ॥ पचास कोटिवीर्य-कुलके और सौ
धौम्र-कुलके असुर सेनापति मेरी आज्ञासे सेनसहित
कूच करें ॥ ५ ॥ कालक, दौर्हृद, मौर्य और कालकेय
असुर भी युद्धके लिये तैयार हों मेरी आज्ञासे तुरंत
प्रस्थान करें' ॥ ६॥ भयानक शासन करनेवाला
असुरराज शुम्भ इस प्रकार आज्ञा दे सहस्रों बड़ी-
बड़ी सेनाओंके साथ युद्धके लिये प्रस्थित हुआ ॥ ७ ॥
उसकी अत्यन्त भयंकर सेना आती देख चण्डिकाने
अपने धनुषकी टंकारसे पृथ्वी और आकाशके
बीचका भाग गूँजा दिया ॥८॥ राजन् ! तदनन्तर
देवीके सिंहने भी बड़े जोर-जोरसे दहाड़ना
आरम्भ किया, फिर अम्बिकाने घंटेके शब्दसे उस
ध्वनिको और भी बढ़ा दिया ॥ ९ ॥ धनुषकी
टंकार, सिंहकी दहाड़ और घंटेकी ध्वनिसे सम्पूर्ण
दिशाएँ गूँज उठीं। उस भयंकर शब्दसे कालीने
अपने विकराल मुखको और भी बढ़ा लिया तथा
इस प्रकार वे विजयिनी हुईं ॥ १०॥ उस तुमुल
नादको सुनकर दैत्योंकी सेनाओंने चारों ओरसे
आकर चण्डिकादेवी, सिंह तथा कालीदेवीको
क्रोधपूर्वक घेर लिया ॥ ११ ॥ राजन् ! इसी बीचमें
असुरोंके विनाश तथा देवताओंके अभ्युदयके
लिये ब्रह्मा, शिव, कार्तिकेय, विष्णु तथा इन्द्र
आदि देवोंकी शक्तियाँ, जो अत्यन्त पराक्रम
और बलसे सम्पन्न थीं, उनके शरीरोंसे निकलकर
उन्हींके रूपमें चण्डिकादेवीके पास गयीं
॥ १२-१३ ॥ जिस देवताका जैसा रूप, जैसी
वेश-भूषा और जैसा वाहन है, ठीक वैसे ही
साधनोंसे सम्पन्न हो उसकी शक्ति असुरोंसे युद्ध
करनेके लिये आयी ॥ १४ ॥ सबसे पहले हंसयुक्त
विमानपर बैठी हुई अक्षसूत्र और कमण्डलुसे
सुशोभित ब्रह्माजीकी शक्ति उपस्थित हुई, जिसे
ब्रह्माणी कहते हैं ॥१५॥ महादेवजीकी शक्ति
वृषभपर आरूढ़ हो हाथोंमें श्रेष्ठ त्रिशूल धारण
किये महानागका कङ्कण पहने, मस्तकमें चन्द्ररेखासे
विभूषित हो वहाँ आ पहुँची ॥ १६ ॥
कार्तिकेयजीकी शक्तिरूपा जगदम्बिका उन्हींका
रूप धारण किये श्रेष्ठ मयूरपर आरूढ़ हो हाथमें
शक्ति लिये दैत्योंसे युद्ध करनेके लिये आयीं ॥ १७ ॥
इसी प्रकार भगवान् विष्णुकी शक्ति गरुड़पर
विराजमान हो शङ्ख, चक्र, गदा, शार्ङ्गधनुष तथा
खड्ग हाथमें लिये वहाँ आयी ॥ १८ ॥ अनुपम
यज्ञवाराहका रूप धारण करनेवाले श्रीहरिकी जो
शक्ति है, वह भी वाराह शरीर धारण करके वहाँ
उपस्थित हुई ॥१९॥ नारसिंही शक्ति भी नृसिंहके
समान शरीर धारण करके वहाँ आयी। उसकी
गर्दनके बालोंके झटकेसे आकाशके तारे बिखरे
पड़ते थे ॥ २० ॥ इसी प्रकार इन्द्रकी शक्ति वज्र
हाथमें लिये गजराज ऐरावतपर बैठकर आयी।
उसके भी सहस्र नेत्र थे। इन्द्रका जैसा रूप है,
वैसा ही उसका भी था ॥ २१ ॥