संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइन्द्रादि देवताओं द्वारा देवीकी स्तुति
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ऋषिरुवाच ॥ ३८ ॥
इति प्रसादिता देवैर्जगतोऽर्थे तथाऽऽत्मनः।
तथेत्युक्त्वा भद्रकाली बभूवान्तर्हिता नृप ॥ ३९ ॥
इत्येतत्कथितं भूप सम्भूता सा यथा पुरा।
देवी देवशरीरेभ्यो जगत्त्रयहितैषिणी ॥ ४० ॥
पुनश्च गौरीदेहात्सा समुद्भूता यथाभवत् ।
वधाय दुष्टदैत्यानां तथा शुम्भनिशुम्भयोः ॥ ४१ ॥
रक्षणाय च लोकानां देवानामुपकारिणी।
तच्छृणुष्व मयाऽऽख्यातं यथावत्कथयामि ते ॥ ह्रीँ ॐ ॥ ४२ ॥
ऋषि कहते हैं- ॥ ३८ ॥ राजन् ! देवताओंने
जब अपने तथा जगत्के कल्याणके लिये
भद्रकाली देवीको इस प्रकार प्रसन्न किया,
तब वे 'तथास्तु' कहकर वहीं अन्तर्धान हो
गयीं ॥ ३९ ॥ भूपाल ! इस प्रकार पूर्वकालमें
तीनों लोकोंका हित चाहनेवाली देवी
जिस प्रकार देवताओंके शरीरोंसे प्रकट हुई
थीं, वह सब कथा मैंने कह सुनायी ॥ ४० ॥
अब पुनः देवताओंका उपकार करनेवाली वे
देवी दुष्ट दैत्यों तथा शुम्भ-निशुम्भका वध
करने एवं सब लोकोंकी रक्षा करनेके लिये
गौरीदेवीके शरीरसे जिस प्रकार प्रकट
हुई थीं, वह सब प्रसङ्ग मेरे मुँहसे सुनो।
मैं उसका तुमसे यथावत् वर्णन करता
हूँ ॥ ४१-४२ ॥
इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये शक्रादिस्तुतिर्नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
उवाच ५, अर्धश्लोकौ २, श्लोकाः ३५, एवम् ४२, एवमादितः ॥ २५९ ॥
इस प्रकार श्रीमार्केण्डेयपुराणमें सावर्णिक मन्वन्तरकी कथाके अन्तर्गत देवीमाहात्म्यमें
'शक्रादिस्तुति' नामक चौथा अध्याय पूरा हुआ ॥ ४ ॥
१. किसी-किसी प्रतिमें 'गौरीदेहा सा' 'गौरी देहात्सा' इत्यादि पाठ भी उपलब्ध होते हैं।