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सर्वकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

पृष्ठ 202, कुल 296 में से

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पृष्ठ 202

२०२ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *
हृदयमें कृपा और युद्धमें निष्ठुरता-ये दोनों बातें
तीनों लोकोंके भीतर केवल आपमें ही देखी
गयी हैं ॥२२॥ मातः! आपने शत्रुओंका नाश
करके इस समस्त त्रिलोकीकी रक्षा की है। उन
शत्रुओंको भी युद्धभूमिमें मारकर स्वर्गलोकमें
पहुँचाया है तथा उन्मत्त दैत्योंसे प्राप्त होनेवाले
हमलोगोंके भयको भी दूर कर दिया है, आपको
हमारा नमस्कार है ॥२३॥ देवि! आप शूलसे
हमारी रक्षा करें। अम्बिके ! खड्गसे भी हमारी
रक्षा करें तथा घण्टाकी ध्वनि और धनुषकी
टंकारसे भी आप हमलोगोंकी रक्षा करें ॥ २४ ॥
चण्डिके! पूर्व, पश्चिम और दक्षिण दिशामें आप
हमारी रक्षा करें तथा ईश्वरि ! अपने त्रिशूलको
घुमाकर आप उत्तर दिशामें भी हमारी रक्षा
करें ॥ २५ ॥ तीनों लोकोंमें आपके जो परम
सुन्दर एवं अत्यन्त भयङ्कर रूप विचरते रहते हैं,
उनके द्वारा भी आप हमारी तथा इस भूलोककी
रक्षा करें ॥ २६ ॥ अम्बिके ! आपके कर पल्लवोंमें
शोभा पानेवाले खड्ग, शूल और गदा आदि जो
जो अस्त्र हों, उन सबके द्वारा आप सब ओरसे
हमलोगोंकी रक्षा करें ॥ २७ ॥
ऋषिरुवाच ॥ २८ ॥
एवं स्तुता सुरैर्दिव्यैः कुसुमैर्नन्दनोद्भवैः ।
अर्चिता जगतां धात्री तथा गन्धानुलेपनैः ॥ २९ ॥
भक्त्या समस्तैस्त्रिदशैर्दिव्यैर्धूपैस्तु धूपिता।
प्राह प्रसादसुमुखी समस्तान् प्रणतान् सुरान् ॥ ३० ॥
ऋषि कहते हैं- ॥ २८ ॥ इस प्रकार जब
देवताओंद्वारा उनका पूजन किया, फिर सबने मिलकर जब
भक्तिपूर्वक दिव्य धूपोंकी सुगन्ध निवेदन की, तब
देवीने प्रसन्नवदन होकर प्रणाम करते हुए सब
देवताओंसे कहा - ॥ २९-३० ॥
देव्युवाच ॥ ३१ ॥
ब्रियतां त्रिदशाः सर्वे यदस्मत्तोऽभिवाञ्छितम् ॥ ३२ ॥
देवी बोलीं- ॥ ३१ ॥ देवताओ! तुम सब
लोग मुझसे जिस वस्तुकी अभिलाषा रखते हो,
उसे माँगो ॥ ३२ ॥
देवा ऊचुः ॥ ३३ ॥
भगवत्या कृतं सर्वं न किंचिदवशिष्यते ॥ ३४ ॥
यदयं निहतः शत्रुरस्माकं महिषासुरः ।
यदि चापि वरो देयस्त्वयास्माकं महेश्वरि ॥ ३५ ॥
संस्मृता संस्मृता त्वं नो हिंसेथाः परमापदः ।
यश्च मर्त्यः स्तवैरेभिस्त्वां स्तोष्यत्यमलानने ॥ ३६॥
तस्य वित्तर्द्धिविभवैर्धनदारादिसम्पदाम् ।
वृद्धयेऽस्मत्प्रसन्ना त्वं भवेथाः सर्वदाम्बिके ॥ ३७ ॥
देवता बोले- ॥ ३३ ॥ भगवतीने हमारी सब
इच्छा पूर्ण कर दी, अब कुछ भी बाकी नहीं
है ॥ ३४ ॥ क्योंकि हमारा यह शत्रु महिषासुर मारा
गया। महेश्वरि ! इतनेपर भी यदि आप हमें और
वर देना चाहती हैं ॥ ३५ ॥ तो हम जब-जब
आपका स्मरण करें, तब-तब आप दर्शन देकर
हमलोगोंके महान् संकट दूर कर दिया करें तथा
प्रसन्नमुखी अम्बिके! जो मनुष्य इन स्तोत्रोंद्वारा
आपकी स्तुति करे, उसे वित्त, समृद्धि और वैभव
देनेके साथ ही उसकी धन और स्त्री आदि
सम्पत्तिको भी बढ़ानेके लिये आप सदा हमपर
प्रसन्न रहें ॥ ३६-३७ ॥
देवताओोंने जगन्माता दुर्गाकी स्तुति की और
नन्दनवनके दिव्य पुष्पों एवं गन्ध-चन्दन आदिके
१. पा०-पैः सूर्यंधेता २. मार्कण्डेयपुराणकी आधुनिक प्रतियोंमें - 'ददाम्यहम्पतिप्रीत्या सर्वैरभिः सुपूजिता ।'-
इतना पाठ अधिक है। किसी-किसी प्रतिमें- 'कर्त्तव्यमपरं यच्च दुष्करं तन्न विद्यमहे । इत्याकर्ण्य वचो देव्याः
प्रत्युचुस्ते दिवौकसः ।।' - इतना और अधिक पाठ है।