मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 90, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ें८८ मनुस्मृति ।
'उभयोरेका प्रकृतिः प्रत्ययभेदाच्च भिन्नवद्भाति ।
कश्चिन्मूढः कल्पयति हरिहरभेदं विना शास्त्रम् ॥'
इत्यादि ।
और उक्त वैष्णवलोग, जो चार संप्रदायों में विभक्त हैं
और जिन संप्रदायों की जाग्रति भारत के अन्तिम सम्राट्
पृथ्विराज चौहान के बाद हुई है; उनमें से पहिले संप्रदायवाले
श्रीविशिष्टाद्वैतवादी (आचारी लोग) अपने मत ग्रन्थों में, जो
श्रुति स्मृति पुराण इतिहास में धक्का लगानेवाली विष्णुभक्ति
प्रकट की है उसका दिग्दर्शन किया जाता है—
'तापादिपञ्चसंस्कारैर्महाभागवताः स्मृताः ।
चक्रादिहेतिभिस्तप्तं ताप इत्यभिधीयते ॥
संस्कारः प्रथमः प्रोक्तो द्वितीयः पुण्ड्रधारणम् ।
तृतीयो नामकरणं वैष्णवं पावनं परम् ॥
सर्वज्ञानं चतुर्थं स्यान्मन्त्राध्ययनमुच्यते ।
पञ्चमस्तु हरेः पूजा पञ्चरात्रोक्तमार्गतः ॥
तदीयार्चनपर्यन्तं हरेराराधनं स्मृतम् ।
.इत्येवमादिसंस्कारी महाभागवतः स्मृतः ॥
अन्येत्ववैष्णवाः प्रोक्ता हीनास्तापादिभिर्द्विजाः ।
तथा ह्यवैष्णवा ज्ञेयाः प्राकृताः पापकारिणः ॥
वादशास्त्रेषु निपुणास्ते वै निरयगामिनः ।
अवैष्णवत्वं विप्राणां महापातकसंमितम् ॥
१ आशय । विष्णु और शिव, इन दोनों का भक्तवत्सलता आदि एक ही स्वभाव
है, पर ज्ञानभेद से दो मत मिलते हैं सो यह मानना सर्वनाश का निशान है । एवं,
विष्णु शिववाचक-हरि हर नाम से भी वही बात सिद्ध होती है-हरि हर की एक
प्रकृति ( धातु ) है प्रत्यय ( अ-इ ) भेद से दो नाम मालूम होते हैं, वह शास्त्र
विरुद्ध है ।