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सर्वकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 571, कुल 649 में से

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पृष्ठ 571

ग्यारहवां अध्याय । ४३१
विरुद्ध कर्म करनेवाले और वेद न पढेहुए द्विज प्रायश्चित्त
करना चाहें तो उनको भी यही तीन कृच्छ्र का प्रायश्चित्त बतावे ।
जो ब्राह्मण निंदित कर्मों से धन कमाते हैं वे उसको छोड़ने और
जप-तप से शुद्ध होते हैं । एकाग्रचित्त से तीन हज़ार गायत्री का
जप करके एक महीना गोष्ठ में दुग्धाहार करके, बुरे दान लेने के
पाप से छूटता है । उस उपवास से कृश, गोष्ठ से आए विनीत
ब्राह्मण से पूछे कि हे सौम्य ! “क्या तू हमारे समान रहने की
प्रतिज्ञा करना चाहता है ?” उन ब्राह्मणों से ‘अब असत् दान
न लूंगा’ यह सत्यवचन कहे और गौओं को चारा देवे फिर
गौओं से पवित्र किए स्थान (जहां जल पीती हों) में वे ब्राह्मण
उसके साथ व्यवहार आरम्भ करें । व्रात्यों को यज्ञ कराकर माता,
पिता और गुरु से अन्य का प्रेतकर्म कराके मारणकर्म और
'व्रात्य' नामक यज्ञ करके तीन प्राजापत्य व्रत करने से शुद्ध
होता है । शरणागत को छोड़कर अनधिकारी को वेद पढ़ाकर एक
वर्ष जौ खाय तो पाप से छुटकारा पाता है । गाँव के रहनेवाले
कोई जीव कुत्ता, सियार, गदहा, मांसाहारी जीव, मनुष्य, घोड़ा,
ऊंट और सुअर काट लें या स्पर्श कर लें तो प्राणायाम से शुद्ध
होता है ॥ १६३-२०० ॥
षष्ठान्नकालता मासं संहिताजप एव वा ।
होमाश्च सकला नित्यमपाङ्क्त्यानां विशोधनम् ॥२०१॥
उष्ट्रयानं समारुह्य खरयानं तु कामतः ।
स्नात्वा तु विप्रो दिग्वासाः प्राणायामेन शुद्धयति ॥२०२॥
विनाद्भिरप्सु वाप्यार्तः शारीरं सन्निवेश्य च ।
सचैलो बहिराप्लुत्य गामानभ्य विशुद्ध्यति ॥ २०३ ॥
वेदोदितानां नित्यानां कर्मणां समतिक्रमे ।
स्नातकव्रतलोपे च प्रायश्चित्तमभोजनम् ॥ २०४ ॥