मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंआठवां अध्याय। २६७
एषोखिलेनाभिहितो दण्डपारुष्यनिर्णयः ।
स्तेनस्यातः प्रवक्ष्यामि विधिं दण्डविनिर्णये ॥ ३०१ ॥
मार्ग में पशु या दूसरी गाड़ी से रुकने पर भी सारथी हाँकते
चला जाय और किसीके चोट लग जाय तो राजा तुरंत नीचे
लिखा दण्ड करेः--मनुष्य का प्राणघात हुआ हो तो चोर के
मुवाफ़िक़ दण्ड गौ, हाथी, ऊंट, घोड़ा आदि बड़े पशुओं का घात
होने पर पांच सौ पण दण्ड करे । छोटे छोटे पशुओं की हिंसा
होने पर दो सौ पण और मृग, मोर वगैरह सुन्दर पक्षी मर जायँ
तो पचास पण दण्ड करे । गधा, बकरी और भेड़ मरें तो पाँच
माषक दण्ड करे । कुत्ता, सुअर मरे तो एक माषक दण्ड करे ।
स्त्री, पुत्र, दास, शिष्य और छोटा भाई अपराध करें तो रस्सी या
बाँस की छड़ी से ताड़न के योग्य हैं, परन्तु इनके पीठ में मारे,
शिर आदि में न मारे, नहीं तो चोर के समान दण्ड योग्य होता है।
इस प्रकार मार पीट का पूरा निर्णय कहा, अब चोर के
दण्ड का निर्णय कहेंगे ॥ २६५-३०१ ॥
परमं यत्नमातिष्ठेत्स्तेनानां निग्रहे नृपः ।
स्तेनानां निग्रहादस्य यशो राष्ट्रं च वर्धते ॥ ३०२ ॥
चोर-दण्डनिर्णय ।
राजा चोरों को दण्ड देने में सदा पूरा यत्न करे । क्योंकि
चोरों के निग्रह से राजा का यश और राज्य वृद्धि को
पाता है ॥ ३०२ ॥
अभयस्य हि यो दाता स पूज्यः सततं नृपः ।
सत्रं हि वर्धते तस्य सदैवाभयदक्षिणम् ॥ ३०३ ॥
सर्वतो धर्मषड्भागो राज्ञो भवति रक्षतः ।
अधर्मादपि षड्भागो भवत्यस्य ह्यरक्षतः ॥ ३०४ ॥
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