मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 286, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ें१४६ मनुस्मृति ।
आकाशेशास्तु विज्ञेया बालवृद्धकृशातुराः ।
भ्राता ज्येष्ठःसमः पित्रा भार्या पुत्रःस्वका तनुः॥१८४॥
आचार्य ब्रह्मलोक का स्वामी है । पिता प्रजापति, अतिथि इन्द्र-
लोक, ऋत्विक् देवलोक का प्रभु है । पुत्रवधू आदि अप्सरालोक
की अधीश्वरी हैं । कुटुम्बी वैश्वदेवलोक, नातेदार वरुणलोक और
पिता माता भूलोक के ईश्वर हैं । बालक, वृद्ध, दुर्बल और रोगी
आकाश के ईश्वर हैं । बड़ा भाई पिता के समान है । स्त्री और पुत्र
अपना शरीर जानना चाहिए ॥ १८२-१८४ ॥
छाया स्वो दासवर्गश्च दुहिता कृपणं परम् ।
तस्मादेतैरविक्षिप्तः सहेतासंज्वरः सदा ॥ १८५ ॥
अपनी छाया दासजन हैं और पुत्री कृपापात्र है । इस कारण
इन सब लोगों से अपना अपमान होने पर भी उसको सहन कर
लेना किन्तु झगड़ा न करना चाहिए ॥ १८५ ॥
प्रतिग्रहसमर्थोऽपि प्रसङ्गं तत्र वर्जयेत् ।
प्रतिग्रहेण ह्यस्याशु ब्राह्मं तेजः प्रशाम्यति ॥ १८६ ॥
न द्रव्याणामविज्ञाय विधिं धर्म्यं प्रतिग्रहे ।
प्राज्ञः प्रतिग्रहं कुर्यादवसीदन्नपि क्षुधा ॥ १८७ ॥
हिरण्यं भूमिरश्वं गामन्नं वासस्तिलान् घृतम् ।
प्रतिगृह्णन्नविद्वांस्तु भस्मीभवति दारुवत् ॥ १८८ ॥
हिरण्यमायुरन्नं च भूगौँश्चाथोषतस्तनुम् ।
अश्वश्चक्षुस्त्वचं वासो घृतं तेजस्तिलाः प्रजाः॥१८६॥
अतपास्त्वनधीयानः प्रतिग्रहरुचिर्द्विजः ।
अम्भस्यश्मप्लवेनेव सह तेनैव मज्जति ॥ १९० ॥