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सर्वकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 285, कुल 649 में से

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पृष्ठ 285

[Header] चौथा अध्याय । १४५
परिणाम में दुःख देनेवाला धर्म भी न करना। और जिस धर्म के
आचरण से लोक में निन्दा हो वह धर्म भी न करना। पुरुष को
हाथ, पैर और आंखों की चञ्चलता न करनी चाहिए । झूठी,
सच्ची लोकनिन्दा आदि से वाणी की चंचलता न रखनी चाहिए
और दूसरे का अनभल कभी न सोचना चाहिये ॥ १७५-१७७ ॥
येनास्य पितरो याता येन याताः पितामहाः ।
तेन यायात्सतां मार्गं तेन गच्छन्न रिष्यते ॥ १७८ ॥
ऋत्विक्पुरोहिताचार्यैर्मातुलातिथिसंश्रितैः ।
बालवृद्धातुरैर्वैद्यैर्ज्ञातिसम्बन्धिबान्धवैः ॥ १७६ ॥
मातापितृभ्यां यामीभिर्भ्रात्रा पुत्रेण भार्यया ।
दुहित्रा दासवर्गेण विवादं न समाचरेत् ॥ १८० ॥
एतैर्विवादान् संत्यज्य सर्वपापैः प्रमुच्यते ।
एभिर्जितैश्च जयति सर्वांल्लोकानिमान् गृही ॥ १८१ ॥
जिस उत्तम मार्ग से अपने बाप, दादा चलते आये हों उस मार्ग
से चलना चाहिए । इस प्रकार के आचरण से पुरुष अधर्म से नष्ट
नहीं होता । ऋत्विक्, पुरोहित, आचार्य, मामा, अतिथि, आश्रित,
बालक, बूढ़ा, रोगी, वैद्य, जाति के पुरुष, नातेदार, कुटुम्बी, माता,
पिता, दौरानी, जेठानी, ननँद, भावज आदि भाई, पुत्र, स्त्री बेटी और
नौकरों के साथ झगड़ा न करना चाहिए। गृहस्थ इनके साथ झगड़ा
बखेड़ा न करे तो सब पापों से छूट जाता है और इनको वश
में करके सब लोकों में जय पाता है ॥ १७८-१८१ ॥
आचार्यों ब्रह्मलोकेशः प्राजापत्ये पिता प्रभुः ।
अतिथित्विन्द्रलोकेशो देवलोकस्य चर्त्विजः॥१८२॥
यामयोऽप्सरसांलोके वैश्वदेवस्य बान्धवाः ।
सम्बन्धिनो ह्यपांलोके पृथिव्यां मातृमातुलौ ॥१८३॥
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