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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 168, कुल 649 में से

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पृष्ठ 168

३८ मनुस्मृति ।
गार्भैर्होमैर्जातकर्मचौडमौञ्जीनिबन्धनैः ।
वैजिकं गार्भिकं चैनो द्विजानामपमृज्यते ॥ २७ ॥
स्वाध्यायेन व्रतैर्होमैस्त्रैविद्येनेज्यया सुतैः ।
महायज्ञैश्च यज्ञैश्च ब्राह्मीयं क्रियते तनुः ॥ २८ ॥
वर्णधर्म ।
इस प्रकार, धर्म जानने का कारण और जगत् की उत्पत्ति संक्षेप
से कही गई है । अब वर्णधर्म कहे जाते हैं । जो वैदिक पुण्यकर्म
हैं, उनसे द्विजातियों का गर्भाधानादि शरीरसंस्कार करना चाहिये ।
जो कि, दोनों लोक में, पवित्र करनेवाला है । गर्भाधान संस्कार,
जातकर्म, चूडाकर्म, मौञ्जीबन्धन, इन संस्कारों से, शुक्र और
गर्भसम्बन्धि दोष, द्विजातियों के निवृत्त होते हैं । वेदाध्ययन, व्रत,
होम, इज्या-ब्रह्मचारिदशा में देव-पितृतर्पण, पुत्रोत्पादन, महा-
यज्ञ-पञ्चमहायज्ञ, यज्ञ-ज्योतिष्टोमादि, इन सब कर्मों के करने से,
यह शरीर ब्रह्मभाव पानेयोग्य होता है ॥ २५-२८ ॥
प्राङ्नाभिवर्धनात्पुंसो जातकर्म विधीयते ।
मन्त्रवत्प्राशनं चास्य हिरण्यमधुसर्पिषाम् ॥ २९ ॥
नामधेयं दशम्यान्तु द्वादश्यां वास्य कारयेत् ।
पुण्ये तिथौ मुहूर्ते वा नक्षत्रे वा गुणान्विते ॥ ३० ॥
बालक का, नाभिछेद के पूर्व, जातकर्म-संस्कार करे, और अपने
गृह्यसूत्रोक्त विधि के अनुसार, सुवर्ण, मधु और घृत का प्राशन
(चटाना) करावे । फिर आशौच निवृत्त होजाने पर, दशवें
या बारहवें दिन, शुभतिथि-मुहूर्त-नक्षत्र में, बालक का नाम-
करण करे ॥ २९-३० ॥
मङ्गल्यं ब्राह्मणस्य स्यात् क्षत्रियस्य बलान्वितम् ।
वैश्यस्य धनसंयुक्तं शूद्रस्य तु जुगुप्सितम् ॥ ३१ ॥