मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 164, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ें२४ मनुस्मृति ।
कुछ नहीं होसकता । संसार में कोई कर्म बिना इच्छा के होते नहीं
देखा गया । शास्त्रोक्त कर्मों का भलीभांति अनुष्ठान करने से स्वर्ग-
लोक की प्राप्ति और इष्टकाम पूरे होते हैं ॥ ३-५ ॥
वेदोऽखिलो धर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विदाम् ।
आचारश्चैव साधूनामात्मनस्तुष्टिरेव च ॥ ६ ॥
संपूर्ण वेद, धर्ममूल हैं-वेदवेत्ताओं की स्मृति और शील-
ब्रह्मज्ञता, साधु पुरुषों का आचार, और आत्म-सन्तोष ये धर्म
में प्रमाण माने जाते हैं ॥ ६ ॥
यः कश्चित्कस्यचिद्धर्मो मनुना परिकीर्तितः ।
स सर्वोऽभिहितो वेदे सर्वज्ञानमयो हि सः ॥ ७ ॥
सर्वं तु समवेक्ष्येदं निखिलं ज्ञानचक्षुषा ।
श्रुतिप्रामाण्यतो विद्वान् स्वधर्मे निविशेत वै ॥ ८ ॥
श्रुतिस्मृत्युदितं धर्ममनुतिष्ठन् हि मानवः ।
इह कीर्तिमवाप्नोति प्रेत्य चानुत्तमं सुखम् ॥ ६ ॥
जिस वर्ण का जो धर्म मनु ने कहा है, वह सब वेदोक्त है । वेद
संपूर्ण ज्ञान का भण्डार है । विद्वान्, ज्ञानदृष्टिसे, वेदप्रमाण द्वारा
धर्मशास्त्र को जानकर, अपने धर्म में श्रद्धा करे । जो पुरुष, वेद
और स्मृतियों में कहे धर्मों का पालन करताहै, वह संसार में कीर्ति
पाकर, परलोक में अक्षय सुख पाता है ॥ ७-६ ॥
श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयो धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः ।
ते सर्वार्थेष्वमीमांस्ये ताभ्यां धर्मो हि निर्बभौ ॥ १०॥
योऽवमन्येत ते मूले हेतुशास्त्राश्रयाद्विजः ।
स साधुभिर्बहिष्कार्यो नास्तिको वेदनिन्दकः ॥ ११ ॥
वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः ।
एतच्चतुर्विधं प्राहुः साक्षाद्धर्मस्य लक्षणम् ॥ १२ ॥