मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 163, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथ द्वितीयोऽध्यायः ।
विद्वद्भिः सेवितः सद्भिर्नित्यमद्वेषरागिभिः ।
हृदयेनाभ्यनुज्ञातो यो धर्मस्तन्निबोधत ॥ १ ॥
कामात्मता न प्रशस्ता न चैवेहास्त्यकामता ।
काम्यो हि वेदाधिगमः कर्मयोगश्च वैदिकः ॥ २ ॥
दूसरा अध्याय ।
धर्म का लक्षण ।
अब धर्म का सामान्य लक्षण कहते हैं-वेदविशारद, धार्मिक,
राग द्वेष से रहित, महात्माओं ने जिस धर्म का पालन किया और
हृदय से स्वीकार किया उस को सुनो । पुरुष को कामफल का
अभिलाषी होना अच्छा नहीं है और न बिल्कुल इच्छा का त्याग
ही श्रेष्ठ है। क्योंकि बिना इच्छा, वेदाध्ययन और वैदिक कर्मों का
अनुष्ठान नहीं होसकता ॥ १-२ ॥
सङ्कल्पमूलः कामो वै यज्ञाः संकल्पसम्भवाः ।
व्रता नियमधर्माश्च सर्वे सङ्कल्पजाः स्मृताः ॥ ३ ॥
अकामस्य क्रिया काचिद्दृश्यते नेह कर्हिचित् ।
यद्यद्धि कुरुते किंचित् तत्तत्कामस्य चेष्टितम् ॥ ४ ॥
तेषु सम्यग्वर्तमानो गच्छत्यमरलोकताम् ।
यथा सङ्कल्पितांश्चेह सर्वान् कामान् समश्नुते ॥ ५ ॥
इस कर्म से यह इष्टफल होगा-यही संकल्प है । इसलिए सब
कामों का मूल संकल्प है। यज्ञादि सब संकल्प से ही होते हैं।
व्रत, नियम, धर्म सब संकल्प से किये जाते हैं अर्थात् बिना संकल्प