मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 129, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ेंमनुस्मृति में क्षेपक की आशङ्का । १२७
शब्दतः किंवा अर्थतः वेद के कण्टक हैं। यहां एक सुप्रसिद्ध
उदाहरण दिखलाया जाता है-
‘ न मांसभक्षणे दोषो न मद्ये न च मैथुने ।
प्रवृत्तिरेषां भूतानां निवृत्तिस्तु महाफला ॥ ’
'मनु ५ अध्याय ५६ श्लोक.
इसको प्रायः क्षेपक बतलाया करते हैं, पर यह श्लोक उक्त
सातों टीकाओं में व्यवस्था के साथ व्याख्यात हुआ है तब कैसे
क्षेपक होसकता है ? श्रीमद्भागवत में भी इसकी यों व्यवस्था
लिखी है-
'लोके व्यवायामिषमद्यसेवा
नित्यास्तु जन्तोर्नहि तत्र चोदना ।
व्यवस्थितिस्तत्रविवाहदीक्षा-
सुराग्रहैरासुर्निवृत्तिरिष्टा ॥ 'इत्यादि.
११ स्कं० ५ अध्याय ११ श्लोक.
इस प्रकार, पूज्यपाद श्री ६ द्विवेदीजी की धर्मसंहिता के
आधार पर, यह मानवधर्मशास्त्र की भूमिका लिखी गई है।
इसमें वैदिक सनातन धर्मादि का विवेचन निष्पक्षपातभाव से
श्रुति-स्मृति के प्रमाणोंद्वारा जिस प्रकार किया गया है, उसका
महत्त्व विद्वानों कोही यथार्थरूप से ज्ञात.होगा, क्योंकि ‘ वेत्ति
विश्वम्भरा भारं गिरीणां गरिमाश्रयम् ’ कालगति से धर्मादि
में चाहे जितना विपर्यय और विप्लव हो, परन्तु सत्य का लोप
होना सर्वथा असम्भव है, और उसकी मर्यादा सर्वदा अजरा-
मर ही रहेगी । जगत् का प्रवाह तो सदा से ही नियन्त्रित
चला आता है ।