मन्त्र रामायण (नीलकण्ठ चतुर्धर - पं. रामकुमार राय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Mantra Ramayana of Nilakantha with Hindi Commentary
नीलकण्ठ चतुर्धर (टीकाकार: पं. रामकुमार राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमन्त्ररामायण ६३
शंनोनिवेशे द्विपदे चतुष्पदेऽस्मे वाजाः सोम तिष्ठंतु कृष्टयः ॥८२॥
ऋ. १०. ६६, ७
एक माह में सीता को खोज लेंगे। इस प्रतिज्ञा से च्युत होकर
नदी के प्रवाह के समान शीघ्रगामी वानर सीता को खोजते हुए पाताल
में प्रविष्ट होकर नरक में गये हुये के समान हो गये। तब उन्होंने सोम
राजा की स्तुति की कि 'हमलोगों का कल्याण करें। हम लोग संग्राम
में शत्रु को पराजित करें।' इस प्रकार स्तुति करने पर वे सब बिल
से निकल कर पृथ्वी पर आये।
नेन्द्राद्वत इत्युक्तं तदेव स्पष्टयति-सिन्धोरिवेति । सिन्धोः नद्याःप्रवणे निर्झर-
प्रपाते इव यथा प्रविष्टाः वृषच्युताः स्वातन्त्र्यलक्षणान्धर्मात् च्युताः प्रयाहवशा
भवन्ति, एवमेव शीघ्रगाभिनोपि वानराः निम्ने नीचे पातालमध्ये प्रविष्टाः
सन्तः वृथाः मासेन सीताशुद्धिमानेष्याम इति स्वप्रतिज्ञात्मकः येषांधर्मः ततः
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