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सर्वकोश
मन्त्र रामायण (नीलकण्ठ चतुर्धर - पं. रामकुमार राय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

मन्त्र रामायण (नीलकण्ठ चतुर्धर - पं. रामकुमार राय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Mantra Ramayana of Nilakantha with Hindi Commentary

नीलकण्ठ चतुर्धर (टीकाकार: पं. रामकुमार राय) द्वारा

DevanagariHindipublished145 पृष्ठ

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पृष्ठ 97

अत्यक्रमीदर्जुनं वारमव्ययमतकं न निक्तं परिसोमो अव्यत ॥७९॥
ऋ. ६. ६६, ४
कामाकुल रावण अन्यत्र रमण करता है। रावण अपने दोष से
भोग्य देवों के द्वारा प्रदत्त सुख को भी अधर्माधिक्य से नष्ट कर रहा
है। कृष्णावतार में अर्जुन वृक्ष बने हुए नलकूबर द्वारा भूतकाल में
रम्भा को बलपूर्वक पकड़ने पर रम्भा ने उन्हें शाप दे दिया कि किसी
स्त्री के साथ बलपूर्वक रति करने पर पाण्डु के समान मरण को प्राप्त
होंगे। अतः वह सीता के विषय में हठब्रह्मचर्य का पालन करता है।
पूर्वोक्तमेव विवृणोति-उक्षेति । उक्षेवोक्षाःरेतः सेचनकामः मिमाति आत्मानं
हिनस्ति, अन्यत्रारमणात् । यतो धेनवः इव धेनवः आगताः दिव्यस्त्रियः प्रतिवन्ति
परावृत्य गच्छन्ति, तावतैव देहस्य धर्मस्य देवीर्देवाङ्‌गनाः निष्कृतिम् आनृण्यम्
उपयन्ति, रावणकृतो धर्मस्तस्मै दिव्याङ्गनाः समर्प्य कृतार्थोऽभूत् न हि तस्य
भोगपर्यन्तं व्यापारोस्ति, रावणस्तु स्वदोषात् भोगभागभूत् देवदत्तमपि सुखम्
अधर्माधिक्यान्नाशयतीति भावः । अतीति-अर्जुनं कृष्णावतारे अर्जुनवृक्षतां प्राप्तं
नलकूबरं भाविदृत्त्या भूतवृत्त्या वाऽर्जुनशब्दवाच्यम् अव्ययं याति मनसा गच्छ-
तीत्यव्ययम् रम्भा सम्भोगार्थिनं वारं बालं स्वपुत्रम् अत्यक्रमीत् । वध्व्युः रम्भाया
आक्रमणेनातिक्रान्तवान्, अतस्तेन शप्तो मरणभयान्न सीतां बलाद्भोक्तुमिच्छति ।
ननु पाण्डुवन्मरणभयमप्यतिकामुकत्वात्कुतो न त्यजतीत्यत आह-अत्कमिति ।
सततं गच्छतीत्यत्को नित्यप्रवासी परिव्राट्, न शब्द इवार्थे परिव्राजमिव निक्तं
निर्णिंक्तं सीताविषये हठब्रह्मचर्यं तं सोमश्चित्ताधिष्ठाता सकलराक्षससंहारमिच्छन्
परि परितः चित्तप्रभावात् कामात् अव्यत अरक्षत् । अतोऽयं मां न स्पृष्टवान्
यदि स्पृशेत्, तर्हि नलकूबरशापेन सद्यो नश्येदित्यात्मशुद्धिरुक्ता ॥ ७९ ॥
अशुक्लेन रुशता वाससा हरिरमर्यो निर्णिजानः परिव्यत ।
दिवस्पृष्टं बर्हणा निर्णिजे कृतोपस्तरणं चम्वोर्नभस्मथम् ॥८०॥
ऋ. १०. ६६, ५
पहले न देखी गयी मुझ सीता को तुमने कैसे जाना ? यह पूछने पर
हनुमान कहते हैं : 'अलौकिक वानर रूपी मेरे द्वारा आप मलिन होने
पर भी सोने के कण के समान देदीप्यमान, वस्त्र से वियोगिनी दिखने
से जान ली गयी हैं। सुख के उच्च स्थान राम की पत्नी आपको मैंने
पहचान लिया ! आकाश में भी शक्तिशाली, ब्रह्माण्ड का शोधन करने