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सर्वकोश
मन्त्र रामायण (नीलकण्ठ चतुर्धर - पं. रामकुमार राय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

मन्त्र रामायण (नीलकण्ठ चतुर्धर - पं. रामकुमार राय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Mantra Ramayana of Nilakantha with Hindi Commentary

नीलकण्ठ चतुर्धर (टीकाकार: पं. रामकुमार राय) द्वारा

DevanagariHindipublished145 पृष्ठ

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पृष्ठ 78

teषां च पुर एता पुरोहितो वसिष्ठोऽभवत् आदित्
अस्माद्वासिष्ठादेव । तृत्सूनामिति तृप्सूनां वर्णलोप विकारावार्षौ रामदर्शनेनैव
तृप्तिमिच्छतां विशः प्रजा अप्रथन्त प्रथां गताभरतादिषु राज्यमनिच्छत्सु वसिष्ठ
एव राज्यं चकारेत्यर्थः । बोधार्थी जीवः शास्त्रगुर्वधीनोऽसङ्गः सन् दैहिकं कर्मा-
करोदित्यर्थः ॥ मन्त्रोयं स्पष्टलिंगः ॥ ४४ ॥
ओषु स्वसारः कारवे शृणोत ययौ वो दूरादनसा रथेन ।
निषूनमध्वं भवतासुपारा अधो अक्षाः सिन्धवः स्रोत्याभिः ॥४५॥
ऋ. ३. ३३, ९
राम लक्ष्मण के वन जाने पर राम का अनुगमन करते हुए विश्वामित्र
ने मध्यमार्ग में आयी हुई नदी से प्रार्थना की : 'बहन के समान
हे नदी ! तुम मेरे मधुर वचनों को सुनो ! राक्षस वधादि कर्त्ता राम
के तुम्हारे पास आने पर तुम्हें सुगमतापूर्वक पार हो जाने वाली हो
जाना