सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
मन्त्र रामायण (नीलकण्ठ चतुर्धर - पं. रामकुमार राय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

मन्त्र रामायण (नीलकण्ठ चतुर्धर - पं. रामकुमार राय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Mantra Ramayana of Nilakantha with Hindi Commentary

नीलकण्ठ चतुर्धर (टीकाकार: पं. रामकुमार राय) द्वारा

DevanagariHindipublished145 पृष्ठ

पृष्ठ 59, कुल 145 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 59

मन्त्ररामायण २३
रथिरपरत्वमेवास्य मन्त्रस्यावसेयम् ॥ १२ ॥
स जातो गर्भो असि रोदस्योरग्ने चारुर्विभृत ओषधीषु ।
चित्रः शिशुः परि तमांस्यक्तून्प्र मातृभ्योधिक निक्रददूगाः ॥१३॥
ऋ० १०. १, २
हे अग्नि ! तुम पृथ्वी और आकाश के मध्य उत्पन्न हुए हो न कि
माता-पिता के शरीर में शुक्र शोणित रूप गर्भ से, क्योंकि मन्त्रज्ञों के
द्वारा आग्नेय चरु रूप धारण करके सुन्दर आश्चर्य मय शिशु कौश-
ल्यादि माताओं को प्राप्त करके रोया ।
एवं प्रक्षिप्तस्येश्वरस्य वह्निरेव शरीरत्वं गत इत्याह सजात इति । हे अग्ने
त्वं रोदस्योर्द्यावा पृथिव्योरेव मध्ये न तु मातापित्रोः शरीरे शुक्रशोणितरूपेण
गर्भो जातोऽसि । यतः ओषधीषु आग्नेयचरुरूपासु विभृतः मन्त्रविद्भिर्धृतः चारुः
सुन्दरः चित्रोनेकाश्चर्यमयः, शिशुः तमांस्यक्तून् तमोमयीर्मोहरात्री