महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें८६ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र
तांबे या मिट्टी का 'शराब' (प्याला) उक्त पत्तों के ऊपर रखें (१४५)। हे वरानने ! दो वस्त्रों द्वारा इस घट के
गले को बाँधें। शक्ति-मन्त्र हो तो लाल और विष्णु-मन्त्र हो तो सफेद वस्त्र की विधि है (१४६)। फिर निम्न
मन्त्र से 'घट' को स्थिर करें—
स्थां स्थों ह्रीं श्रीं स्थिरीभव ।
इस प्रकार स्थिर किए गए घट में 'पञ्च-तत्त्व' छोड़ें और तब नौ पात्रों की स्थापना करें (१४७) ।
'शक्ति-पात्र' चाँदी का, 'गुरु-पात्र' सोने का, महा-शङ्ख (नर-कपाल) या नारिकेल का 'श्रीपात्र' और
तांबे के अन्य पात्र होने चाहिए (१४८)। महा-देवी की पूजा में पत्थर, लकड़ी और लोहे के पात्र का उपयोग न
करें। सामर्थ्य के अनुसार अन्य पदार्थों के ही पात्र रखें (१४६) । पात्रों की स्थापना कर गुरुओं और भगवती
(आनन्दभैरवादि) का तर्पण करने के बाद गुरुदेव अमृत-पूर्ण 'घट' की पूजा करें (१५०)। तब धूप, दीप दिखा-
कर सर्व-भूत को बलि प्रदान करें। उसके बाद पीठ-देवतादि की पूजाकर षडङ्ग-न्यास करें (१५१)। फिर प्राणा-
याम कर महेश्वरी का ध्यान और आवाहन कर अपनी सामर्थ्य के अनुसार इष्ट-देवता की पूजा करें।
पूजा के समय वित्त-शास्र (अर्थात् अपनी सामर्थ्य के अनुरूप खर्च न कर कंजूसों से कार्य करना) अनुचित
है (१५२) ।
हे शिवे ! गुरुदेव होम तक के कर्म करने के बाद पुष्प, चन्दन और वस्त्र द्वारा क्रमशः कुमारी, शक्ति
और साधकों की पूजा करें (१५३)। तब गुरुदेव उपस्थित कौल-साधकों से अपने शिष्य का 'पूर्णाभिषेक' करने
की अनुमति माँगें—
अनुगृह्णन्तु कौला मे शिष्यं प्रति कुल-व्रताः । पूर्णाभिषेक-संस्कारे भवद्भिरनुमन्यताम् ।।
अर्थात् हे कुल-व्रत-परायण कौल-गण ! आप लोग मेरे शिष्य पर अनुग्रह करें और पूर्णाभिषेक-संस्कार
को अनुमति दें।
चक्रेश्वर के इस प्रकार कहने पर कौल लोग आदर-सहित चक्रेश्वर गुरुदेव से कहें कि—
महा-माया-प्रसादेन प्रभावात् परमात्मनः । शिष्यो भवतु पूर्णस्ते पर-तत्त्व-परायणः ।।
अर्थात् महा-माया के प्रसाद और परमात्मा के प्रभाव से आपका शिष्य परंब्रह्म में तत्पर होकर पूर्ण होवे
(१५४-५५) ।
तदनन्तर गुरुदेव शिष्य द्वारा देवी की पूजा करायें और पूजित 'घट' के ऊपर 'काम-माया-रमा' अर्थात्
'क्लीं ह्रीं श्रीं' इस मन्त्र का जप कर उस निर्मल 'घट' को निम्न मन्त्र से हिलावें—
उत्तिष्ठ ब्रह्म-कलश ! देवात्मक ! सिद्धिद ! त्वत्-तोय-पल्लवैः सिक्तः शिष्यो ब्रह्म-रतोऽस्तु मे ।।
अर्थात् हे सिद्धि-दायक, देवता-स्वरूप, ब्रह्म-कलश ! तुम उठो। तुम्हारे जल और पल्लव द्वारा सिक्त
होकर मेरा शिष्य ब्रह्म में रत होवे (१५६-५७)।
तब शिष्य को गुरुदेव उत्तर की ओर मुख करके बैठाएँ और निम्न मन्त्रों से घटस्थ जल से पञ्च-पल्लवों
के गुच्छे द्वारा उसका अभिषेक करें (१५८)—
ॐ शुभ-पूर्णाभिषेकस्य सदाशिव ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, आद्या देवता, ॐ वीजं, शुभ-
पूर्णाभिषेकार्थे विनियोगः ।
गुरवस्त्वाभिषिञ्चन्तु ब्रह्म-विष्णु-महेश्वराः । दुर्गा-लक्ष्मी-भवान्यस्त्वामभिषिञ्चन्तु मातरः ।।१