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महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

पृष्ठ 92, कुल 139 में से

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पृष्ठ 92

८२ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र
दातारो मे विवर्द्धन्तां बहून्यन्नानि सन्तु मे । याचितारः सदा सन्तु मा च याचामि कञ्चन ॥
अर्थात् दया-मय पितृ-गण मुझे आशीर्वाद दें । मेरे वेद-ज्ञान, पुत्रों और बान्धवों की नित्य वृद्धि हो । मुझे
दान देनेवालों की वृद्धि हो। मेरे पास बहुत अन्न हो। याचक लोग सदा मेरे पास बने रहें और मैं किसी से
याचना न करूँ (५७-५८) ।
इसके बाद देव-पक्ष से आरम्भ कर ब्राह्मणों और सभी पिण्डों का विसर्जन करे । फिर देव-पक्ष, पितृ-पक्ष
और मातामह-पक्ष के लिए दक्षिणा प्रदान करे (५६) । तब दश बार गायत्री और पाँच बार 'देवताभ्यः पितृ-
भ्यश्च' इस मन्त्र का जप कर अग्नि तथा सूर्य का दर्शन करने के बाद हाथ जोड़कर ब्राह्मण से पूछे (६०)—
इदं श्राद्धं साङ्गं जातम् ?
अर्थात् क्या यह श्राद्ध सभी अङ्ग-कार्यों-सहित सम्पन्न हो गया ?
ब्राह्मण उत्तर दें—
विधानतः सम्यगेव साङ्गं जातम् ।
अर्थात् विधि के अनुसार यह सम्पूर्ण रूप से सभी कार्यों के सहित सम्पन्न हो गया (६१) ।
तब अङ्ग-वैगुण्य की शान्ति के लिए दश बार प्रणव 'ॐ' का जप कर अच्छिद्राभिविधान द्वारा कर्म को
समाप्त करे । पात्र के अन्न और पिण्डों को ब्राह्मण को दे दे (६२) । ब्राह्मण न हो, तो गाय या बकरी को दे दे
या उन्हें जल में डाल दे ।
'नित्य' अर्थात् अवश्य करणीय संस्कार में यहो 'वृद्धि-श्राद्ध' कहा गया है (६३) । अमावास्या आदि पर्व
के उपलक्ष्य में करणीय श्राद्ध को 'पार्वण श्राद्ध' कहते हैं (६४) । देवतादि-प्रतिष्ठा, तीर्थ-यात्रा और तीर्थ में
'पार्वण श्राद्ध' की विधि के अनुसार श्राद्ध करे (६५) । इन सब श्राद्ध-कार्यों में पितृ-गण को 'नान्दीमुख' विशेषण
से युक्त न करे और 'नमोस्तु पुष्ट्यै' के स्थान पर 'नमः स्वधायै' कहे (६६) ।
हे वरानने ! पिता आदि पुरुष-त्रय में से जो जीवित हो, उसके ऊपरवाले पुरुष का उल्लेख कर श्राद्ध करे
(६७) । पिता, पितामह, प्रपितामह—ये तीनों पुरुष यदि जीवित हों, तो श्राद्ध न करे । उनके प्रसन्न रहने से ही
श्राद्ध और यज्ञ का फल मिल जायगा (६८) । हे कल्याणि ! पिता जीवित हों, तो माता और पत्नी के श्राद्ध एवं
'नान्दीमुख-श्राद्ध' के सिवा अन्य किसी श्राद्ध के करने का अधिकार नहीं होता (६६) । 'एकोद्दिष्ट श्राद्ध' करते
समय विश्वदेव-गण को पूजा न करे । उसके स्थान पर एक ही व्यक्ति को लक्ष्य कर अनुज्ञा-वाक्य की कल्पना
करे (७०) । दक्षिणाभिमुख होकर अन्न और पिण्ड-दान करे । यव के स्थान पर तिल प्रदान करे, शेष सामग्री
पूर्ववत् ही रखे (७१) ।
'प्रेत-श्राद्ध' में यह विशेषता है कि उसमें गङ्गादि की पूजा न करे और अन्न तथा पिण्ड-दान के समय
मृत व्यक्ति का उल्लेख 'प्रेत' कहकर करे (७२) । एक व्यक्ति के उद्देश्य से जो श्राद्ध किया जाता है, उसे 'एको-
द्दिष्ट' कहा जाता है । 'प्रेत-श्राद्ध' में प्रेत के अन्न और पिण्ड में मत्स्य और मांस प्रदान करे (७३) । हे कुल-
नायिके ! अशौच के अन्त के दूसरे दिन यह श्राद्ध करे, इसी को 'प्रेत-श्राद्ध' कहते हैं (७४) ।
जहाँ गर्भ-स्राव हो या बालक जन्म लेकर पृथ्वी पर मर जाय, वहाँ से अतिरिक्त स्थान पर सन्तान के
जन्म लेने या मरने पर कुलाचार के अनुसार 'अशौच' का पालन करे । ब्राह्मण के लिए दश दिन, क्षत्रिय के
लिए बारह दिन, वैश्य के लिए पन्द्रह दिन और शूद्र एवं सामान्य जाति के लिए एक मास का 'अशौच' माना
गया है (७५-७६) हे शिवे ! अ-सपिण्ड जाति के मरने पर और सपिण्ड के मरने पर 'अशौच'-काल के बाद