सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

पृष्ठ 71, कुल 139 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 71

६२ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र
इसके बाद शिष्य सुख-दुःखादि-रूप द्वन्द्वों से रहित; कामनाओं से रहित, स्थिर-चित्त और साक्षात् ब्रह्म-
मय होकर भू-तल पर स्वेच्छानुसार विचरण करे (२६६)। वह ब्रह्म से स्तम्ब अर्थात् तृण-गुच्छ पर्यन्त सारे
विश्व को सत्-स्वरूप समझे, नाम-रूप को भूलकर आत्मा से आत्मा का ध्यान करता हुआ, आवास-शून्य, क्षमा-
शील, निःशङ्क-हृदय, संसर्ग-शून्य, ममता-शून्य, अहङ्कार-शून्य और संन्यासी होकर भू-मण्डल में विचरण करे
(२७०-७१)। वह शास्त्र के विधि-निषेध से मुक्त हो जाता है। वह प्राप्त विषय की रक्षा और अप्राप्य विषय के
पाने की चेष्टा न करे। वह सुख-दुःख में समान, धीर, जितेन्द्रिय और इच्छा-शून्य रहे (२७२)। दुःख होने पर
भी उसका अन्तःकरण स्थिर रहता है और सुख होने पर वह उसकी स्पृहा नहीं करता। वह सदा आनन्द-युक्त,
पवित्र, शान्त, निरपेक्ष और व्याकुलता से शून्य रहता है (२७३)। वह किसी व्यक्ति को उद्विग्न न करे; सदा सब
प्राणियों का हित करने में लगा रहे; क्रोध, भय, सङ्कल्प और उद्यम से वह शून्य रहे (२७४)। शोक, द्वेष से
शून्य और शत्रु-मित्र में समदर्शी रहे। वह शीत, वात, धूपादि प्रकृति के कष्टों के सहन करने में समर्थ बने और
मान-अपमान को समान समझे (२७५)। शुभ-अशुभ को समान रूप में देखे। अपने आप प्राप्त होनेवाली वस्तुओं
से ही वह सन्तुष्ट रहे। वह त्रिगुणातीत, निर्विकल्प, लोभ-शून्य होकर सञ्चय से दूर रहे (२७६)।
जगत् मिथ्या-स्वरूप होने पर भी जिस प्रकार एकमात्र सत्य-स्वरूप परमात्मा का आश्रय लेकर सत्य
प्रतीत होता है, उसी प्रकार आत्मा का आश्रय लेकर मिथ्या-भूत यह देह आत्म-वत् प्रतीत होती है, इसे अनुभव
कर संन्यासी सुखी हो (२७७)। इन्द्रियाँ अलग-अलग अपने-अपने कर्म करती हैं। आत्मा साक्षी और निर्लिप्त है,
इसे जानकर संन्यासी मोक्ष को प्राप्त करता है (२७८)। संन्यासी धातु-द्रव्य का लेना, पर-निन्दा, मिथ्या व्यवहार
स्त्रियों के साथ क्रीड़ा, शुक्र-त्याग और असूया-इन सबका परित्याग करे (२७६)। परिव्राजक संन्यासी देवता,
मनुष्य या कीट सबके प्रति समदर्शी हो। सभी कर्मों के समूह-रूप जगत् को 'ब्रह्म' ही जाने (२८०)। ब्राह्मण
का अन्न हो या चाण्डाल का, जिस किसी व्यक्ति का अन्न हो और किसी भी देश से आया हो, यह सब देश-काल
का विचार न कर भोजन करे (२८१)। अवधूत व्यक्ति स्वेच्छाचारी होकर भी वेदान्त आदि अध्यात्म-शास्त्र के
अध्ययन और सदा आत्म-तत्त्व के विचार करने में अपना समय बिताए (२८२)।
संन्यासियों की मृत देह को कभी जलाए नहीं। इस देह को गन्ध-पुष्पादि से अर्चित कर भूमि में समाधिस्थ
करे या जल में डुबो दे (२८३)। हे देवि ! सदा कामाभिलाषी मनुष्य, जिन्हें योग नहीं प्राप्त होता, ऐसे सभी लोगों
की स्वभावतः कर्मकाण्ड में प्रवृत्ति होती है (२८४)। ये लोग कर्मकाण्ड में आसक्त होकर ध्यान, पूजा, जप आदि
साधनों में दृढ़ होकर उन्हीं को कल्याणकारी मानते हैं (२८५)। इसी कारण मैंने चित्त-शुद्धि के लिए कर्मकाण्ड
का विधान बताया है और इसीलिए मैंने बहुत प्रकार के नाम-रूपों की कल्पना की है (२८६)। हे देवि ! ब्रह्म-
ज्ञान और कर्म-संन्यास के बिना सौ कल्पों तक भी कर्म करने से कोई व्यक्ति मुक्ति को प्राप्त नहीं कर सकता
(२८७)। ब्रह्म-ज्ञान-सम्पन्न कुलावधूत मनुष्याकृति होकर भी जीवन्मुक्त है। गृहस्थ उन्हें साक्षात् नारायण जान-
कर उनकी पूजा करते हैं (२८८)। यति का दर्शन करने मात्र से मनुष्य के सभी पाप दूर होकर उन्हें तीर्थ,
तपस्या, दान और सभी यज्ञानुष्ठानों का फल प्राप्त होता है (२८६)।