महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 68, कुल 139 में से
संदर्भ में पढ़ेंआठवाँ उल्लास : वर्णाश्रम-आचार-धर्म का कथन । ५६
(२०७) । हे देवि ! जिन्हें इस प्रकार का भाव है कि 'सब कुछ ब्रह्म ही है, वही 'तत्त्व-चक्री' हैं अर्थात् उन्हें ही
'तत्त्व-चक्र' करने का अधिकार है (२०८) । इसमें घट की स्थापना नहीं होती, विस्तृत रूप में पूजा नहीं होती ।
सभी स्थानों में ब्रह्म-भाव से तत्त्व-साधन करे (२०६) । हे प्रिये ! ब्रह्म-मन्त्रोपासक और ब्रह्म-निष्ठ व्यक्ति चक्रे-
श्वर बने । ब्रह्मज्ञ साधकों के साथ 'तत्त्व-चक्र' का आरम्भ करे (२१०) ।
रमणीय, अत्यन्त निर्मल और साधकों को सुखदायक प्रदेश में विचित्र आसन लाकर विमल आसन की
कल्पना करे (२११) । हे शिवे ! चक्रेश्वर ऐसे स्थान में ब्रह्म-साधकों के साथ बैठकर तत्त्व-समुदाय को एकत्र
करे और तब उन्हें सामने स्थापित करे (२१२) । चक्रेश्वर सभी तत्त्वों पर तार-प्रणव अर्थात् 'ॐ हंसः' मन्त्र
का सौ बार जप कर निम्न मन्त्र का पाठ करे (२१३)—
ब्रह्मार्पणं ब्रह्म-हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् । ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्म-कर्म-समाधिना ॥
अर्थात् जिसके द्वारा यज्ञ में घृतादि अर्पित किया जाता है, उसे 'अर्पण' कहते हैं अर्थात् स्रुवा आदि—
वह ब्रह्म है । जो वस्तु अर्पित की जाती है अर्थात् घृत आदि—वह भी ब्रह्म है । ब्रह्म-अग्नि में स्वयं ब्रह्म द्वारा
आहुति दी जाती है अर्थात् अग्नि और होम-कर्त्ता भी ब्रह्म हैं। इस प्रकार ब्रह्म-कर्म में जिसका चित्त एकाग्र होता
है, वही ब्रह्म को प्राप्त करता है (२१४) ।
उक्त मन्त्र 'ब्रह्मार्पणं......समाधिना' को सात या तीन बार जप कर सभी तत्त्वों का शोधन करे
(२१५) । तब ब्राह्म मन्त्र से उन सबको परमात्मा को समर्पित कर ब्रह्मज्ञ साधकों के सहित एक साथ पान और
भोजन करे (२१६) ।
हे महेश्वरि ! इस 'तत्त्व-चक्र' में जाति-गत पृथकता को छोड़ दे। इसमें देश-काल या पात्र का नियम
नहीं है (२१७) । जो मूढ़ लोग इस 'दिव्य-चक्र' में असावधानी से वंश-गत या जाति-गत भेद-भाव करते हैं,
उन्हें अति निकृष्ट गति प्राप्त होती है (२१८) । अतः ब्रह्मज्ञ साधक धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष के लिए सब यत्न करके
'तत्त्व-चक्र' का अनुष्ठान करे (२१६) ।
श्री देवी ने कहा—हे प्रभो ! आपने गृहस्थों के धर्म को विस्तार से कहा है। अब कृपया संन्यास में
विहित धर्मों को कहिए (२२०) ।
श्री सदाशिव ने कहा—हे देवि ! कलि-युग में अवधूताश्रम ही संन्यास कहा गया है। जिस विधि से
संन्यास आश्रम कर्त्तव्य है, उसे अब सुनो (२२१) । ब्रह्म-ज्ञान के उत्पन्न होने पर, सभी काम्य कर्मों से रहित होने
पर, अध्यात्म-विद्या में विशारद व्यक्ति संन्यासाश्रम का अवलम्बन करे (२२२) । वृद्ध पिता-माता, शिशु पुत्र,
पतिव्रता भार्या, असमर्थ बन्धु-वर्ग—इन सबको छोड़कर जो प्रव्रज्या करते हैं, वे नरक को जाते हैं (२२३) ।
कुलावधूत-संस्कार में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और सामान्य जाति—इन पाँचों वर्णों को अधिकार है (२२४) ।
साधक गृहस्थोचित कर्म सम्पन्न कर, अपने सभी स्वजनों को सन्तुष्ट कर, ममता और कामना-शून्य होकर तथा
जितेन्द्रिय हो गृह से बाहर निकले (२२५) । गृहस्थाश्रम त्याग कर जाने की अभिलाषा रखनेवाला व्यक्ति
अपने स्वजन बन्धुओं और आश्रित लोगों तथा गांव के निवासियों को बुलाकर प्रेम-पूर्ण मन से अनुमति देने की
प्रार्थना करे (२२६) । फिर सबकी अनुमति लेकर अभीष्ट देवता को प्रणाम कर गाँव की प्रदक्षिणा कर निरपेक्ष-
हृदय से घर से बाहर निकले (२२७) । संसार-बन्धन से मुक्त होकर परमानन्द से सुखी होकर कुलावधूत ब्रह्मज्ञ
के पास जाकर यह प्रार्थना करे (२२८)—
गृहाश्रमे पर-ब्रह्मन् ! ममैतद् विगतं वयः । प्रसादं कुरु मे नाथ ! संन्यास-ग्रहणं प्रति ॥